पहाड़ में पशुपालन को आजीविका का मजबूत आधार बनाने के दावों के बीच दुग्ध उत्पादकों की मांगें अब सिर्फ ज्ञापनों और बैठकों तक सीमित नहीं रहना चाहतीं। दूध की खरीद दर बढ़ाने, दुग्ध मूल्य प्रोत्साहन में वृद्धि, पशु आहार एवं भूसा अनुदान बढ़ाने, दुग्ध समितियों के सचिवों का प्रोत्साहन बढ़ाने और बिसारी में दुग्ध अवशीतन केंद्र स्थापित करने की मांगों को लेकर पशुपालकों ने आंदोलन जारी रखने का ऐलान किया है। उनका साफ कहना है कि ‘जब तक मांगें पूरी तरह धरातल पर नहीं उतरतीं, आंदोलन स्थगित नहीं होगा।’
चंपावत दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ ने यूसीडीएफ के प्रबंध निदेशक को भेजे पत्र में पशुपालकों और सचिव संगठन की मांगों तथा अब तक हुई कार्रवाई की जानकारी दी है। पत्र में सचिव संगठन के जिलाध्यक्ष राजेश बिष्ट और अन्य पशुपालकों द्वारा हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर 3.50 प्रतिशत वसा और 7.50 प्रतिशत एसएनएफ वाले गाय के दूध की खरीद दर 61 रुपये तथा भैंस के दूध की दर 71 रुपये प्रति लीटर करने की मांग दर्ज की गई है।
इसके साथ ही राज्य सरकार की दुग्ध मूल्य प्रोत्साहन योजना में उत्पादकों को मिलने वाली राशि चार से बढ़ाकर छह रुपये प्रति लीटर करने की मांग भी उठी है। संघ का कहना है कि इस संबंध में दुग्ध क्रय दरों में वृद्धि का प्रस्ताव आगामी प्रबंध कमेटी की बैठक में रखा जाएगा।
पशुपालन की लागत बढ़ी, राहत अभी प्रस्तावों में
पशुपालकों की मुश्किल सिर्फ दूध की खरीद दर तक सीमित नहीं है। पशुआहार, भूसा और साइलेज की बढ़ती लागत के बीच उन्होंने पशुआहार और भूसा पर मिलने वाले अनुदान को 50 से बढ़ाकर 60 प्रतिशत तथा साइलेज पर 60 से बढ़ाकर 80 प्रतिशत करने की मांग की है।
संघ ने समितियों को दूध की मात्रा के आधार पर समय पर पशु चारा उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। आकस्मिक पशु चिकित्सा सेवा और बड़े पशुपालकों तथा मिनी डेयरी इकाइयों के पशुओं के नियमित स्वास्थ्य परीक्षण के लिए रोस्टर तैयार करने की बात भी पत्र में कही गई है।
लेकिन असली सवाल यही है कि पशुपालक को राहत कब मिलेगी—निर्देश जारी होने पर या व्यवस्था जमीन पर उतरने के बाद? पर्वतीय दुग्ध समितियों के सचिवों की आर्थिक स्थिति भी आंदोलन के केंद्र में है। वर्तमान व्यवस्था के तहत पर्वतीय क्षेत्र के दुग्ध सचिवों को समिति द्वारा उपार्जित दूध पर 50 पैसे प्रति लीटर की दर से सचिव प्रोत्साहन दिया जा रहा है। सचिव संगठन ने इसे बढ़ाकर दो रुपये प्रति लीटर करने की मांग की है।
संघ ने अपने पत्र में खुद माना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में दुग्ध उपार्जन मैदानी क्षेत्रों की तुलना में कम है और इसी कारण सचिव प्रोत्साहन योजना लागू की गई है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि पर्वतीय क्षेत्र में कम उत्पादन ही सचिवों की आय को प्रभावित कर रहा है तो क्या मौजूदा प्रोत्साहन वास्तव में उनकी आर्थिक चुनौती के अनुपात में है?
पाटी बिसारी क्षेत्र में दुग्ध अवशीतन केंद्र की मांग ने भी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। संघ के अनुसार प्रस्तावित केंद्र के आसपास के क्षेत्रों से वर्तमान में करीब 900 लीटर प्रतिदिन दूध का उपार्जन हो रहा है। इसके बावजूद दूध के सुरक्षित और समयबद्ध संग्रहण के लिए अवशीतन केंद्र की स्थापना अभी प्रक्रिया में है।
जिलाधिकारी ने इसके लिए जिला स्तरीय निरीक्षण टीम गठित की है। टीम के स्थलीय निरीक्षण, रिपोर्ट और अनुशंसा के बाद नियमानुसार केंद्र स्थापित किए जाने की बात कही गई है।
यानी दूध उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन उसके अनुरूप आधारभूत ढांचा कब तैयार होगा—यह सवाल अब पशुपालक खुलकर पूछ रहे हैं।
दुग्ध उत्पादकों का कहना है कि वर्षों से पशुपालन को स्वरोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनाने की बातें होती रही हैं। लेकिन जब दूध की कीमत, चारे की लागत, पशु चिकित्सा, सचिवों के प्रोत्साहन और दूध के सुरक्षित संग्रहण की बुनियादी जरूरतों की बात आती है तो प्रक्रिया प्रस्ताव, निरीक्षण और बैठक के दायरे में अटक जाती है।
पशुपालकों ने स्पष्ट कर दिया है कि अब केवल आश्वासन से आंदोलन खत्म नहीं होगा। उनका कहना है कि जब तक मांगों पर ठोस निर्णय लेकर उन्हें वास्तविक रूप से लागू नहीं किया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
अब निगाहें दुग्ध संघ की आगामी प्रबंध कमेटी की बैठक और शासन स्तर पर होने वाले निर्णय पर हैं। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि पहाड़ के पशुपालकों की आवाज एक और सरकारी पत्र बनकर फाइलों में दबती है या फिर दूध की कीमत और दुग्ध व्यवस्था में वास्तविक बदलाव की शुरुआत होती है।

More Stories
पिथौरागढ़ की 6 न्याय पंचायतों में सेवा संकल्प अभियान के तहत लगे शिविर
25 सितंबर को कांग्रेस का सचिवालय घेराव, कैंट विधानसभा में नवीन जोशी ने किया जनसंवाद
सीएम धामी की पहल रंग लाई, फिल्म शूटिंग में आई तेजी