पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने गांवों की मौजूदा हालात के लेकर कई बातें कही हैं। हरीश रावत ने बताया है कैसे आज गांव निष्क्रिय होते जा रहे हैं।
———निष्क्रिय होती ग्रामीणियता——-
हां, आज 20-25 वर्ष पहले की तुलना में गांव का जीवन निष्क्रिय सा हो गया है। पहले गांव एक जीवांत गांव होते थे, जीवन से भरपूर हर कोई कुछ न कुछ करता हुआ, चलता-फिरता हुआ दिखाई देता था, महिला-पुरुष, सब बच्चे खेल करते हुए दिखाई देते थे। आज गांवों में बच्चे तो है ही नहीं, मेरे गांव के जूनियर हाई स्कूल में 2-3 बच्चे हैं। गांव में आगे अधूरे जो भी लोग रह रहे हैं उनकी गतिविधियां भी अपने घर, चूल्हे ज्यादा से ज्यादा आंगन तक सीमित हो गई हैं। खेती तो छोड़ दीजिए लोगों ने बाड़े भी बंजर कर दिए हैं। यह तो धन्य कहिए दुग्ध बोनस योजना को इसने दुग्ध व्यवसाय को लाभदायी बना दिया है। इसलिये हमारे अपने गांव में भी कम से कम 20 मवासे हैं जिन्होंने गाय पाल रखी हैं। करीब डेढ़ पौने दो लाख रुपया हर महीने हमारे गांव के दुग्ध वितरण केंद्र में आता है।
पहले गांव के अंदर शायद ही कोई मवासा होता था जिसके पास अपने मवेशी नहीं होते थे, सुबह उनको जंगल या वीरान खेतों में हांकने के लिए आवाजें लगती थी, गांवों में बच्चे खेलते थे, न जाने बचपन के हमारे कितने खेल अब विलुप्तप्राय हो गए हैं। कुछ टीवी ने, कुछ मोबाइल ने और बाकी जो ग्रामीणियता का अभाव बनता जा रहा है उसका असर बच्चों के खेलकूद पर भी पड़ रहा है, उनकी सामूहिकता समाप्त हो रही है, गांवों में बचपन खोजना आज मुश्किल हो गया है, इन वर्षों के अंदर सतत् रूप से ह्रास हो रहा है। पहले सुख-दुख में सबकी हिस्सेदारी रहती थी, आज धीरे-धीरे बहुत कम हो गई है, हमारी बाखली जरा सी बड़ी है, बाखली मतलब गांव का एक छोटा हिस्सा जिसमें कई परिवार एक-दूसरे से जुड़े हुए घरों में रहते हैं। शाम को हर घर के मुख्या को चार-पांच प्रकार की सब्जियां चखने को मिल जाती थी। क्योंकि जो भी सब्जियां अलग-अलग घरों में बनती थी, आपस में एक-एक कटोरी में उसको-पड़ोस पड़ोस बांटा जाता था, कभी किसी के यहां कटहल बन गया, किसी की यहां शिकार बन गया, किसी के वहां दाल बन गई, तो पड़ोस में भी बहुत चखने को मिल जाती थी। आज यह प्रथा तो समाप्त ही हो गई है, किसी के घर कोई मेहमान आ जाए यदि उस समय घर में कोई न हो, तो पड़ोस के घर वाला उसे बैठा करके चाय-पानी पिलाता था। आज जब मेहमान भी आते हैं कब आए, कब गए बाखली में भी इसका पता ही नहीं होता है। खेती-बाड़ी तो खत्म हो रही है। घर हो आंगन-बाड़ी वाला, नेता हो दाढ़ी वाला, यह हमारे गांव के बाजार भतरौजखान की बड़ी चर्चित कहावत थी। आज नेताओं की दाड़ी तो हो सकती है, मगर खेती-बाड़ी छूट गई है। कुछ बहाना जंगली जानवरों, बंदरों का है और कुछ लोगों को यह लगता है कि इतना परिश्रम कर रहे हैं, कुछ लोग यह भी मान कर चलते हैं कि जितना हम परिश्रम कर रहे हैं उसका हमको फायदा नहीं हो रहा है जो लोग यदि खेती-बाड़ी कुछ कर रहे हैं या किसी ने कुछ पेड़ बचा रखे हैं तो कुछ उससे कमाई भी हो रही है।
गांव गांव की कहानी- हरीश रावत
मेरा एक भतीजा जो अब दुनिया में नहीं रहा, उसने एक बार अपने खेत से 3000 की मिर्ची पैदा की और बड़े गर्व से मुझे बताया कि चचा इस खेत में इस बार₹3000 की मिर्च हुई है। अब पता चला है कि जड़ाऊ और मोर, दोनों मिर्च को भी चट कर दे रहे हैं। मेरे घर के सामने किशोर है, बगल में दलजीत है, मैं देखता हूं उन्होंने अपनी सारी बाड़ियां आबाद कर रखी हैं, अच्छी सब्जी उगती है, कुछ माल्टे व नींबू भी हैं, कुछ गेठी भी हैं, उनको अच्छी कमाई हो जा रही है। लेकिन सबसे बड़ा कारण जो मेरी समझ में आया कि क्यों इतनी निष्क्रियता ग्रामीण जीवन में आ गई है, क्यों खेती-बाड़ी छूट गई है और फिर पेट भरने का सामान कहां से जुट रहा है? इसका सबसे बड़ा भारी कारण है कि गांव के एक बड़े हिस्से को मुफ्त का राशन मिल रहा है और अच्छी खासी मात्रा में मिल जा रहा है, बल्कि कई लोग तो उसमें से आधा दुकानदार के पास ही छोड़ देते हैं और वह वहां से मार्केट में चला जाता है, यह मेरे गांव की कहानी नहीं है यह प्रायः पर्वतीय अंचल के सभी गांवों की कहानी है। अच्छा है पौष्टिकता बढ़ रही है, लेकिन निष्क्रियता लोगों के शरीर को मांसल बना रही है, पहले पहाड़ के लोग चाहे पुरुष हो, महिला हो वह छरहरे (स्मार्ट) होते थे। गठिया व सुगर की बीमारी प्रायः होती ही नहीं थी। आज मेरे गांव के 40 प्रतिशत से ऊपर लोग इन बीमारियों से ग्रसित हैं।
आज घुटने बेकार हो गए हैं, वजन बढ़ रहा है, उससे कई तरीके की बीमारियां पैदा हो रही हैं तो इसका बड़ा कारण है कि जब मुफ्त का अनाज मिल रहा है तो आपको उसके लिए और परिश्रम करने की आवश्यकता ही नहीं है, एक अच्छी नीति सरकार ने बनाई, मैं उसका समर्थक हूं लेकिन यह नीति पहले से लागू थी, मगर उस समय ₹2 किलो गेहूं, ₹2 किलो चावल मिलता था, तब लोगों से ₹2 परिश्रम करवाते थे, चाहे मनरेगा में करें चाहे अपने कुछ और दूसरे तरीके के परिश्रम करें, आज वह परिश्रम गायब हो रहे हैं उससे शरीर की सक्रियता गायब हो रही है और धीरे-धीरे जो हमारी ग्रामीण सक्रियता है उसके ऊपर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है, इस स्थिति को बनाए रखना न गांव के हित में है और न गांव के लोगों के हित में है। ग्रामीण जीवन में आ रही यह गति हीनता राष्ट्रीय और राज्य, दोनों स्तर पर नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। गांव हमेशा वाइब्रेंट रहे हैं और आज केंद्र सरकार को सीमांत गांवों के लिए वाइब्रेंट शब्द खोजना पड़ रहा है और उसके लिए योजना बनानी पड़ रही है। यह अलग बात है कि सीमांत विकास योजना बंद कर आपने उसका नामकरण बदल दिया जिसमें वर्तमान सरकार माहिर है। मेरे इस लेख के विषय वस्तु सरकार नहीं है। मेरे लेख की विषय वस्तु एक ऐसी सोच बनाना है जो हमारी ग्रामीण सक्रियता को वापस लाने में सहयोग कर सके। राज्य में हम ऐसी नीति बना सकते हैं जिसके तहत हम मुफ्त राशन धारक के लिए अपनी खेती-बाड़ी में काम करने को एक अनिवार्य तत्व के रूप में सम्मिलित कर सकें। आप मुफ्त अनाज की मात्रा बढ़ा दीजिए, इसके दायरे को भी बढ़ा दीजिए, एपीएल कार्ड धारकों को भी इसमें सम्मिलित कर लीजिए। मगर खेती-बाड़ी इसकी पात्रता का अनिवार्य तत्व हो। जिस समय कांग्रेस ने राष्ट्रीय अन्य सुरक्षा योजना लागू की जिसके तहत ₹2 किलो गेहूं, ₹2 किलो चावल देश की आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से को एक कानूनी हक के रूप में दिया जाने लगा और कार्ड इश्यू कर दिये जाने लगा। आज तो जो मुफ्त अनाज की योजना है, वह पूर्णतः सरकार की कृपाकांक्षा पर है, किसी पार्लियामेंट के एक्ट के जरिए नहीं है। सरकार कभी भी कह सकती है कि अब अनाज वितरण की योजना अपनी उपाध्ययिता समाप्त हो गई है, इसका मकसद पूरा हो गया है, अब इसे बंद किया जा रहा है। लेकिन जो योजना पार्लियामेंट के एक्ट के जरिए लागू थी उसे यूं ही बंद नहीं किया जा सकता था। आज जब देश व्यक्ति मय है तो एक व्यक्ति के निर्णय पर सब कुछ निर्भर करता है। राष्ट्रीय अन्न सुरक्षा का लक्ष्य मनरेगा के साथ मिलकर के पौष्टिकता, धन, रोजगार, आमजन की मदद था ताकि महंगाई आदि से आमजन लड़ सके और मुफ्त योजना का लक्ष्य अब केवल जन समर्थन हासिल करना है। बहरहाल मैं मुफ्त अनाज और मुफ्त धन देने का तब तक पक्षधर हूं जब तक उसका लक्ष्य आम गरीब है। यदि अच्छा होता है इस योजना को किसी न किसी तरीके की उत्पादकता से जोड़ दिया जाता, जैसे मनरेगा योजना है वह उत्पादकता से जुड़ी हुई थी। अन्न सुरक्षा योजना भी उत्पादकता के लिए प्रेरित करती थी क्योंकि आपको खरीदने के लिए कुछ न कुछ अर्जित करना पड़ता था तो आज जो गांवों में आबादी का एक अच्छे खासी हिस्से में निष्क्रियता आ रही है, उस निष्क्रियता को दूर करने के लिए राज्य व केंद्र सरकार को एक चिन्हित योजना बनाना आवश्यक है। आज हालात यहां तक हैं कि जिन घरों के पास ज्यादा यूनिट्स हैं जिनके राशन कार्ड में ज्यादा नाम हैं। अब यह उत्पादकता जो गतिशीलता को लाती है उसको कैसे पैदा किया जाए, यह एक बड़ा भारी यक्ष प्रश्न है! और पलायन के पीछे भी यही एक कारण है आखिर जवान हाथ तो काम मांगेंगे!
पलायन क्यों बढ़ रहा है?
अब गांव में काम में उत्पादकता रह नहीं गई क्योंकि जो उत्पादन हो रहा है वह लाभप्रद नहीं है, केवल दुग्ध उत्पादन को छोड़कर के। फल उत्पादन लाभप्रद हो सकता है मगर इस समय कीवी, अखरोट और सेब, तीनों को छोड़कर के कोई फल लाभदायक नहीं रह गया है। नींबू, माल्टा, नारंगी, यह तीनों अपनी मार्केट लाने तक की कास्ट भी नहीं निकाल रहे हैं, उत्पादक को सही मूल्य नहीं मिल पा रहा है। ऐसी स्थिति के अंदर जो उत्पादक हाथ हैं जो काम करने वाले श्रमशील हाथ हैं, वह हाथ बाहर पलायन कर रहे हैं। पलायन के बहुत सारे कारण हैं। मैं पहले भी कह चुका हूं, जिनमें एक तो सक्षम पलायन है, लोग ज्यादा बेहतर अवसर के लिए बाहर जा रहे हैं। दूसरा पलायन मेडिकल, शिक्षा का पलायन है, अब तो जंगली जानवरों के भय से भी पलायन हो रहा है। मगर जो यह अक्षमता के आधार पर पलायन है, इसको हम यदि बेबशी शब्द कहें तो और ज्यादा उपयुक्त रहेगा, तो जो बेबशी का पलायन है वह पलायन चिंताजनक है। उत्तराखंड आज, जैसे पहले बिहार से पलायन होता था उस तरीके की स्थिति में खड़ा है। इसलिये गांव के गांव सूने हो रहे हैं और उनमें जीवांत हीनता का भाव पैदा हो रहा है उसके लिए आपको कुछ न कुछ प्रेरक कारण पैदा करने पड़ेंगे ताकि यह हीनता शब्द हटे। आपको उत्पादकता के साथ प्रोत्साहन की नीति बनानी पड़ेंगी, इसलिये हमने उत्पादकता पर कई बोनस प्रारंभ किए थे। हम चाहते थे कि प्रत्येक व्यक्ति को कुछ न कुछ काम करने के लिए प्रेरित किया जाए और उसको मालूम रहे कि मैं इस काम को करूंगा तो मुझको इसका सार्थक रिवार्ड मिलेगा जो मुफ्त अनाज की तुलना में ज्यादा मिलेगा। इसीलिये हमने मोटे अनाजों के उत्पादन, वाणिज्यिक फसल जैसे मिर्च, राजमा, हल्दी, अदरक, दालें जिसमें प्रत्येक तरीके की दाल से लेकर की मांस, तोर, मसूर की दाल और साथ-साथ गहत, भट्ट, रेशे आदि इन सबके उत्पादन पर बोनस रखा। मिर्च पर भी बोनस रखा, मिर्च पर्वतीय क्षेत्रों में एक कमर्शियल फसल है। हमने इसलिए चौलाई जिसको हम रामदाना कहते हैं, हमने उसके उत्पादन पर भी बोनस रखा और उसके न्यूनतम खरीद मूल्य निर्धारित किये। मांग बड़ी और उधर जो बोनस था उसने लोगों को इस बात का एहसास कराया कि जिससे हमारी मेहनत का हमको समुचित फल मिल रहा है तो लोग उन उत्पादों को बोने की तरफ आगे बढ़ें। मडुआ बुवाई आदि का क्षेत्र 14 प्रतिशत बड़ा और ज्यों ही राज्य सरकार ने बोनस योजना समाप्त की फिर से मडुवा और समवर्ती उत्पादों के उत्पादक हतोत्साहित होकर पीछे हट गए, आज स्थिति यह है कि मडुआ उत्पादक अपने पीडीएस सिस्टम और आंगनबाड़ी सिस्टम के लिए राज्य के बाहर के सप्लायरों पर निर्भर है। उत्पादकों को चिन्हित करके उनकी जागर लगानी पड़ेगी और उनकी जागर लगाने के लिए जो यह बोनस आदि के प्रोत्साहन हैं यह बहुत आवश्यक हैं। इसलिए ही मैंने जल बोनस योजना प्रारंभ किया। मैंने कहा प्रत्येक व्यक्ति को जल संचय के लिए क्योंकि वर्षा ऋतु में 90 प्रतिशत से ज्यादा पानी बहकर राज्य से बाहर चला जाता है, यदि प्रत्येक परिवार इस बरसाती पानी को संचित कर दे तो इतना बोनस कमा सकता है कि वर्ष भर की बिजली पानी का बिल अदा कर सके। जल के जो दूसरे उपयोग हैं खेती आदि में इसका लाभ तो मिलेगा ही मिलेगा लेकिन वह यदि एक निश्चित मात्रा में पाया जल को संचित करता है तो हमने नियम बनाया था कि उसको जल निगम या जल संस्थान उसका नापन करके उसको बोनस की राशि देगा। वृक्ष बोनस कई तरीके के लाभदायी वृक्षों को जो पशुओं के चारे, कास्ट कला, रेशा उत्पादों के लिए लाभदायक हैं उनको भी इस योजना में सम्मिलित किया गया। रेशा पैदा करने वाले प्रजाति के वृक्ष हैं, पशु चारे के लिए दूध उत्पादित होता है, जिससे कास्ट कला, गेठी, खड़क, बुरांश आदि के वृक्षारोपण में बोनस योजना प्रारंभ की थी और जो फलदायी वृक्ष हैं हमने उनके रोपण पर भी लोगों के लिए बोनस योजना प्रारंभ की और फॉरेस्ट को इसका नोडल बनाया ताकि लोग वृक्षारोपण की तरफ आकृष्ट होकर पर्यावरण संवर्धक का लाभ ले सकें, साथ-साथ उनकी आजीविका से इसका सीधा लाभ मिल सके, इसलिए हमने इस योजना के तहत पर्वतीय क्षेत्रों के च्यूरा, मैदानी क्षेत्रों के महुआ, सेमल के वृक्षारोपण पर भी बोनस का लाभ दिया। दुग्ध बोनस योजना को मैं फिर से नहीं दोहराऊंगा, उसको मैं उस सीमा तक ले जा रहा था जब हम जैविक मिल्क पाउडर, जैविक बकरी का मीट, जैविक चीज उत्पादन तक लेकर के जाने का हमारा लक्ष्य था दुग्ध संघों के माध्यम से और कुछ सीमा तक हम सफल हुए। आज भी इसीलिए न चाहते हुए भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकारों को दुग्ध बोनस का संचालन करना पड़ रहा है तो उसी तर्ज पर हमने एक योजना और प्रस्तावित की थी जिसको चुनाव के वक्त हमने प्रस्तावित किया था, वह थी कुड़ी-बाड़ी सम्मान पेंशन योजना, आप पेंशन कह लीजिए या बोनस योजना कह लीजिए जो अपनी कुड़ी को आबाद रखेगा और पहाड़ी को आबाद करेगा जो अपने मकान में रहेगा गांव में खेती-बाड़ी को आबाद करने का काम करेगा हमने कहा उनको एक निर्धारित पेंशन बोनस के रूप में हर महीने देंगे, इस योजना से ग्रामीण परिवेश को बड़ा लाभ मिलता। आज खेतों की जुताई न होने से पानी धरती के अंदर नहीं जा रहा है अर्थात भू-गर्भ में नहीं जा रहा है और इससे वर्षा ऋतु में जो नए स्रोतों का प्रस्फुटन होता था, वह अब नहीं हो रहा है, हमारे गाड़-गधेरे धीरे-धीरे सूख रहे हैं, इसके परिणाम स्वरूप आद्र पहाड़ शुष्क पहाड़ में बदल रहा है। बीमारियां बढ़ रही हैं और सकल उत्पादकता पर इसका दुष्प्रभाव दिखाई देने लग गया है।इसलिए बहुत आवश्यक है कि खेतों की जुताई हो। आजकल मैं यह पढ़ रहा हूं कि सरकार ऐसे बंजर खेतों की येलो मार्किंग कर रही है, अब कहां तक सही है, कहां तक गलत है, मैं नहीं जानता। लेकिन कास्तकारों व जमीन के मालिकों को एक भय दिखाने की कोशिश हो रही है इसके प्रभाव अब्सेंटी लैंडलॉर्ड अपनी जमीनें बेच रहे हैं। इससे राज्य के अंदर एक नई चुनौती खड़ी होने जा रही है। आवश्यकता भय दिखाने की नहीं है, प्रोत्साहन की है। ज्यादा से ज्यादा भय+प्रोत्साहन अर्थात पेंशन योजना लागू करने की है। मैं समझता हूं कि बहुत सारे लोग अपनी खेती को आबाद करना प्रारंभ करेंगे, किसी न किसी रूप में करेंगे उसके साथ मल्टीप्ल बोनस योजना जो हमने प्रारंभ की थी वह सब समाग्रहित होकर के फिर से गांव के जीवन में लाभप्रद उत्पादकता के तत्व को लाने में सफल हो सकते हैं और जब तक आप गांव में लाभप्रद उत्पादकता को लेकर के नहीं आएंगे तो गांवों की जीवंतता लौट करके नहीं आएगी, केवल नारों से अब इस बीमारी का समाधान नहीं होगा। इसके लिए नाड़ी वैद्य के साथ-साथ एक अच्छे शल्य चिकित्सक के रूप में राज्य के मुख्यमंत्री को काम करना पड़ेगा और राज्य के अंदर ऐसी बातों में बहस भी प्रारंभ करनी पड़ेगी। मुझे एक सबसे बड़ी चिंता यह है कि बहुत सारे बुनियादी सवाल उत्तराखंड के अंदर समय-समय पर उठते रहते हैं और बहुत सारे लोग उठाते रहते हैं और बहुत समझदारी भरे सवाल उठते हैं। पिछले दिनों में देख रहा था कि एक नागरिक चार्टर भी समिट करने की बात कही गई है तो यह आइडियाज हैं, जिन आइडियाज पर ही किसी समाज की गतिशीलता निर्भर करती है, जीवंतता निर्भर करती है, तो यह आइडियाज आते हैं, उन आइडियाज पर बहस भी प्रारंभ होनी चाहिए। मैं समाचार पत्रों के संपादक महोदयान से भी प्रार्थना करना चाहूंगा कि अपने उसमें एक काॅलम ऐसी चीजों के लिए जरूर रखकर के छोड़ें जिसमें इस तरह के आइडियाज उठते हैं, उन आइडियाज पर लोग क्या कह रहे हैं, उस पर कुछ बातचीत हो, सोशल मीडिया में भी केवल बधाई, बैकअप, जय हिंद, इन तक सोशल मीडिया को सीमित नहीं करना चाहिए। सोशल मीडिया को विचार प्रवाह को आगे बढ़ाने में भी आगे बढ़ाया जाना चाहिए। बल्कि मैं अपने साथियों व सहयोग से भी कहना चाहूंगा कि कुछ समूह बनाएं और उन समूहों को आप हमारे विचार प्रभावों के साथ जोड़ें, मैं नहीं कह रहा हूं कि एक संपुष्ट विचार प्रभाव हों इसमें बहुत सारी कमियां हो सकती हैं, इसमें थोड़ी बहुत राजनीति भी लोग देख सकते हैं, आलोचना करें, मगर वह आलोचना आगे पढ़ने वाले लोगों के लिए इसलिए प्रेरित करेगी कि इसमें यह बुनियादी और सुधार हों, इससे समाज व राज्य को दिशा मिलेगी, सरकारों व राजनीतिक, सामाजिक व विकास के कार्यकर्ताओं को दिशा मिलेगी।
।। जय हिंद, जय ग्रामीणियता।।

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