मूल निवास भू कानून स्वाभिमान रैली की सफलता के बाद, अगला सवाल है कि आगे क्या? ये सवाल बना हुआ है। इस मांग को पूरा कैसे कराया जाए इसे लेकर चर्चा जारी है। आंदोलन का अहम हिस्सा रहे डॉ. प्रेम बहुखंडी ने इस मुद्दे पर रोडमैप बताया है।
प्रेम बहुखंडी ने क्या कहा?
वैसे तो नीति यह कहती है कि इसका फैसला हमें समन्वय समिति की बैठक में करना चाहिए था, लेकिन चूंकि अब यह जन आन्दोलन बनने की तरफ अग्रसर है तो समन्वय समिति में चर्चा से पूर्व ही मैं, इस मुद्दे को जनता के बीच सार्वजानिक मंच से रख देता हूँ ताकि लोग इस पर अपने विचार प्रकट कर सकें

– पहला प्रश्न तो यह है कि कल की रैली के लिए पिछले दो महीने से प्रयास चल रहे थे, अनेक साथी रात दिन लगे रहे. मतलब कि भविष्य के कार्यक्रम के लिए कुछ और साथी आगे आयें।
– कल के नारे थे –
o सुन ले दिल्ली – देहरादून, हमें चाहिए – मूल निवास – भू कानून,
o हम हमारे हक़ चाहते, नहीं किसी से भीख मांगते
o जल जंगल जमीन हमारी, नहीं चलेगी धौंस तुम्हारी.
ये नारे स्पष्ट रूप से हमारे आक्रोश और इरादों को प्रदर्शित कर रहे थे. लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि जादूगर की जान तो तोते में रहती है, ये जिन लोगों को सत्ता का गुरुर हो रहा है, जो कल हमारे खिलाफ, 500 रूपये में, नदी नालों के किनारे से ध्याड़ी पर लाये मजदूरों के बीच नाच रहे थे, ये तब तक नहीं सुधरेंगे जब तक तोते का गला न दबाया जाये. मतलब कि अब आन्दोलन उस स्थान पर होना चाहिए जहाँ से ये लोग अपनी ताकत बटोरते हैं. अर्थात छोटे कस्बों, और तहसीलों में .
1. धर्म :
देव भूमि है, धार्मिक कार्य, कथा- भागवत आदि नित्य रूप से होते रहते हैं. अब उत्तराखंड में धार्मिक कार्य- कर्मकांड- देवता नचाना, कथा वाचन, करने वालों से निवेदन करना होगा कि वे अपने हर आयोजन के पश्चात, भू कानून और मूल निवास की बात करें. वे लोगों को बतायें कि भू कानून और मूल निवास कितना आवश्यक है अपनी संस्कृति के लिए….हर धार्मिक कार्य के पश्चात सभी भक्तों से शपथ लें कि वे किसी बाहरी व्यक्ति को जमीन नहीं बेचेंगे और इस आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेंगे.
2. संस्कृति:
कल एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र का सुझाव था कि चूंकि यह संस्कृति बचाने की लड़ाई भी है, अस्तित्व का सवाल भी है इसलिए इसे लोक संस्कृति से जोड़ना चाहिए – उत्तरायनी का मेला, गिन्दी मेला, मकर संक्रान्ति का स्नान और मेले, खिचड़ी संक्रान्ति नजदीक आ रहे हैं। हमें इन आयोजनों को, भू कानून और मूल निवास से जोड़ना होगा. स्पष्ट है कि भू कानून और मूल निवास रहेगा तो तभी ये त्यौहार रहेंगे वरना हम गिद्दा – भांगड़ा और छठ पूजा करते रहने को मजबूर हो जायेंगे. अगर भू कानून नहीं रहा और डेढ़ आँख वाले बाबा की नजर यमकेश्वर -दुगड्डा की जमीनों पर रही तो फिर गिन्दी मेला भी कहाँ होगा?

राज्य के संस्कृति कर्मियों ने, इस बार Narendra Singh Negi और Upreti Sisters के नेतृत्व में, बहुत अच्छा सहयोग किया, सक्रिय भूमिका निभाई. अन्य लोगों से भी निवेदन है कि भविष्य में होने वाले सभी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी इस मुद्दे पर चर्चा अवश्य करें .
3. संगठन:
1994 में कुछ गलतियाँ हुई थी, आन्दोलन स्वतःस्पूर्त था, लोग अपने अपने स्तर पर नेतृत्व कर रहे थे, लेकिन कोई बड़ा नेता उभर नहीं पाया और नहीं कोई बड़ा संगठन इसका नेतृत्व अपने हाथ में ले पाया. उक्रांद खुद को नेता मानता जरूर है पर उनकी स्वीकार्यता अभी बहुत दूर की बात है, कोई राष्ट्रीय दल इतनी हिम्मत नहीं कर सकता कि वो इस पर खुलकर सामने आ सके.—-मतलब कि कुछ संगठनात्मक दिशा में सोचना होगा.

4. संसाधन:
एक और सवाल है संसाधनों का- बिना संसाधनों के तो एक दिन भी चलना मुश्किल है, चंदाखोरों से तो हम लोग पहले भी परेशान रहे हैं, इसलिए कुछ ऐसी व्यवस्था करनी पड़ेगी कि जिसमें पूर्ण रूप से पारदर्शिता बनी रहे.
5. कार्यालय :
देहरादून में, आपस में मिलने, और काम करने के लिए एक दफ्तर की जरूरत हमें कई दिन से महसूस हो रही है, किसी पेड़ के नीचे या रेस्टोरेंट में बैठकर, थोड़े दिन काम चल सकता है लेकिन आन्दोलन को अलगे स्तर पर ले जाने के लिए एक कार्यालय की जरूरत पड़ेगी. जहाँ कुछ रिसर्च होगी, कुछ पढ़ा जायेगा कुछ लिखा जायेगा, गीत बनेगे- नारे लिखे जायेंगे, शिक्षण – प्रशिक्षण होगा, मतलब आन्दोलन से सम्बंधित काम होगा।

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