लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने एक बार फिर अपनी ही पार्टी की रणनीति पर सवाल उठाए हैं। हरीश रावत ने उत्तराखंड में कांग्रेस की चुनावी तैयारी और चुनाव लड़ने की रणनीतियों में खामी गिनाकर खलबली मचा दी है। साथ ही अपने अनुभव का हवाला देकर कई सुझाव भी पार्टी लीडरशिप को दिए हैं। हरीश रावत का दावा है कि आज जिस चुनौती में चुनाव लड़ना है उस हिसाब से जमीन पर कांग्रेस की तैयारी बेहद कमजोर है।
हरीश रावत का दावा है कि उत्तराखंड में अभी तक चुनाव प्रबंधन नाम की कोई चीज नहीं दिख रही। हरीश रावत के इस बयान से कांग्रेस में खलबली मचना तय है
हरीश रावत ने क्या संदेश दिया?
सनद रहे, चुनाव प्रबंधन मेरा एक मासूम सा उद्बोधन! उत्तराखंड में सबसे ज्यादा अलग-अलग परिस्थितियों में चुनाव लड़ने और लड़ाने के अनुभवजन्य ने शब्द चुनाव प्रबंधन, चुनाव प्रबंधन मात्र उम्मीदवार चयन नहीं है उसके बाद हर लोकसभा क्षेत्र में समन्वय, उम्मीदवार और उम्मीदवारी की चाह रखने वाले लोगों के मध्य, उम्मीदवारी की चाह रखने वाले लोगों के समर्थक के मध्य, आज की स्थिति में तो अधिकांश विधानसभा क्षेत्रों में विधायक या विधायकी के पूर्व उम्मीदवारों और जिला कांग्रेस व ब्लॉक कांग्रेस कमेटियों के मध्य भी समन्वय का अभाव दिखाई दे रहा है।
सत्य नकारा नहीं जा सकता है। नकारेंगे तो नुकसान उठाना पड़ेगा। चुनाव प्रबंधन में प्रचार प्रबंधन भी महत्वपूर्ण है, प्रचारकों के साथ मीडिया मैनेजमेंट और दुष्प्रचार मैनेजमेंट भी आवश्यक है, 2022 में एक सफेद झूठ को भयंकर दुष्प्रचार का रूप दे दिया गया, हम चुनाव प्रचार के दौरान उसका सफल प्रतिरोध नहीं कर पाए परिणाम स्वरूप जीतती बाजी हार गये। प्रबंधन की चूक के साथ-साथ संभावित स्थानीय प्रबंधकों के चुनाव में अपने-अपने चुनाव में जुटे रहना, झूठ का व्यवस्थित पर्दाफाश न करना भी एक वास्तविकता है और इस बार सौभाग्य से हमारे पास उत्तराखंड में कुछ अतिरिक्त दैवीय मददें उपलब्ध हैं, जिनमें कई जनवादी संगठन और हमारे गठबंधन के सहयोगी दल, उनकी क्षमताओं के उपयोग का प्रबंधन करना भी एक बड़ी आवश्यकता है चुनाव जीतने के लिए, विधानसभा चुनाव में चुनाव प्रबंधन की कमी यदि हम 2022 की स्वीकारते हैं तो फिर हमको यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकसभा का चुनाव वह भी उत्तराखंड जैसी विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य के अंदर, क्या 20 दिन के अंदर एक उम्मीदवार उपरोक्त सभी प्रबंधन संभालने की स्थिति में है? क्या को-ऑर्डिनेशन उम्मीदवार के स्तर पर संभव है ? चुनाव प्रबंधन प्रांतीय स्तर पर ही नहीं, लोकसभा स्तर पर भी आवश्यक है और उस प्रबंधन का नक्शा कहीं दिखाई नहीं दे रहा है!! हां एक झलक पांच कोऑर्डिनेटर्स की नियुक्ति है, मगर उन नियुक्तियों से आगे का रोड मैप पूरी तरीके से ओझल है, फिर भी एक पक्षीय सोच के साथ प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। मीडिया तो छिद्र खोजेगा, मगर हमें शब्दों के छिद्रों में फंसने के बजाए पारस्परिक विश्वास से काम लेना चाहिए, अब भी देर नहीं हुई है। मैंने अपने अनुभव आधारित ज्ञान को सार्वजनिक कर दिया है ताकि भविष्य के लिए सनद रहे कि हरीश रावत ने सारी कटुताएं और आलोचनाएं झेल कर भी अपना कर्तव्य पूरा किया।

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