मूल निवास और भू कानून के मुद्दे पर उत्तराखंड में बड़ा अभियान चल रहा है। कल एक रैली भी देहरादून में होनी है। इस बीच समाजिक कार्यकर्ता और आंदोलनकारी अतुल सती ने भी अपनी बात साझा की है। अतुल सती ने कई उदाहरण देकर इस आंदोलन की अहमियत और जरुरत को समझाया है।
मूल निवास और भू कानून से इतर कुछ जरूरी सवाल जिनकी उपेक्षा खतरनाक होगी ..

सन 2011 में देश में एक राष्ट्रव्यापी आन्दोलन खड़ा हुआ ।
जिसमें कहा गया कि सशक्त लोकपाल विधेयक अगर पारित हो गया तो सब ठीक हो जायेगा ।
सारी समस्याओं का एक ही हल लोकपाल ।
तब भी कुछ लोगों ने इस महाशोर के बीच यह साहस पूर्वक और मजबूती से कहा कि सिर्फ एक लोकपाल बैठाने से आप भ्रष्टाचार की समस्या से निजात नहीं पा सकते । और भ्रष्टाचार सिर्फ लेन देन का मसला नहीं है । इसके बहुत से पहलू हैं । यह एक व्यापक मसला है ।
इसके अतिरिक्त देश में असंतोष सिर्फ इस ही वजह से नहीं था । किंतु देश में फैले असंतोष को मात्र भ्रष्टाचार और उसके एक मात्र उपाय लोकपाल तक सीमित कर दिया गया ।जिससे किसानों की आत्महत्या ,देश में कृषि संकट ,छात्र नौजवानों की समस्या से लेकर आर्थिक उदारीकरण से उपजे तमाम संकटों को पीछे धकेल दिया ।
उत्तराखंड में मूल निवास और भू कानून को लेकर हो रहे आन्दोलन के सन्दर्भ में भी यही हो रहा है । यह जो दो सवाल हैं यह राज्य की मूल अवधारणा के अन्य सवालों से जुड़े हुए हैं। जल जंगल पर जनता के अधिकार, रोजगार के सवाल, भूमि सुधार का सवाल, राज्य की स्थाई राजधानी, नशा, पलायन,परिसीमन, महिलाओं की रक्षा और अस्मिता की रक्षा का सवाल यह सब ही राज्य की अवधारणा के मूल सवाल हैं ।
इनमें से प्रत्येक पर ही बात करके हम इस राज्य को गर्त में जाने से बचा सकते हैं ।
विकास का जो ढांचा मॉडल पहाड़ में खड़ा हो रहा है वह कैसे इस पूरे हिमालयी क्षेत्र को तबाह बर्बाद कर रहा है । आपदाओं से लगातार जूझ रहे पहाड़ी क्षेत्र में यह विकास कितना घातक हो रहा है और भविष्य में होने वाला है ..यह भी हमारी चिंता का विषय होना चाहिये।
सिर्फ एक सवाल को हर समस्या का हल मान लेने से बाकी सारे जरूरी सवाल पीछे रह जाते हैं.. जबकि वे भी उतने ही जरूरी हैं .. बल्कि कुछ लोगों के लिए तो वे छूट गए सवाल उनके होने न होने के अस्तित्व के सवाल हैं ।
इस तरह हम सत्ता को भी बाकी के महत्वपूर्ण सवालों से किनारा करने का मौका खुद ही उपलब्ध करवा देते है । और सत्ता में बैठे लोग जानते ही हैं कि कैसे इन मुद्दों को ठिकाने लगाना है । जैसे कि 2011 के लोकपाल आन्दोलन का हुआ । सत्ता ने लोकपाल के नाम पर जो जोक मजाक किया वह हम जानते ही हैं । और किसको उसका लाभ हुआ वह भी सर्व विदित ही है । वैसे ही जैसे भू कानून के सवाल को लैंड जेहाद में बदल कर सरकार सत्ता ने इस महत्वपूर्ण सवाल को बिलकुल अलग दिशा दे दी । और अभी मूल निवास के सवाल को हल्का और दिशा हीन करने के लिए सरकार ने आदेश निकाल दिया कि जिनके पास मूल निवास है उनसे स्थाई निवास नहीं मांगा जाएगा । जबकि सभी जानते हैं कि मूल निवास प्रमाण पत्र तो दशकों से बन ही नहीं रहे हैं ..उसकी जगह स्थाई निवास बनाना पड़ता है जो हर 6 महीने में रद्द हो जाता है ..फिर से बनाना पड़ता है ।
इसलिए हमें पुराने अनुभव से सीखते हुए सत्ता को अपने मूल सवालों से ध्यान भटकाने या उन्हें पलटने का मौका नहीं देना चाहिये । हमारे लिये राज्य की अवधारणा से जुड़े सारे सवाल अहम हैं और सब पर बोलना लड़ना चाहिए। सत्ता को बच निकलने का सुरक्षित गलियारा देने से बचना चाहिए। बहुत से सवाल लोगों के अस्तित्व से जुड़े हैं उनकी उपेक्षा लोगों के और इस राज्य के भविष्य के लिए बड़ा महत्व है ।
अपेक्षा और उम्मीद है कि आन्दोलन के नेतृत्व कारी और उत्तराखंड के प्रबुद्ध जन इस पर बोलेंगे ।

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