19 February 2026

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युवाओं को नशे की लत से बाहर निकालने के लिए अहम पहल

युवाओं को नशे की लत से बाहर निकालने के लिए अहम पहल

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखण्ड सरकार द्वारा प्रदेश को नशे की गिरफ्त से बाहर निकालने और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने हेतु निर्णायक कदम उठाया गया है। शासन ने राज्य के सभी जिलों में मानसिक स्वास्थ्य पुनर्विलोकन बोर्ड (Mental Health Review Boards) को सक्रिय करने का फैसला लिया है, साथ ही नशा मुक्ति और पुनर्वास केंद्रों पर राज्य व्यापी निरीक्षण अभियान शुरू किया है।

स्वास्थ्य सचिव डॉ. आर. राजेश कुमार ने बताया मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में मानसिक स्वास्थ्य और नशामुक्ति सेवाओं को सुधारने के लिए एक ठोस नीति और सख्त अमल की शुरुआत कर दी है। यह अभियान प्रदेश में स्वस्थ, सुरक्षित और नशामुक्त वातावरण की दिशा में एक सार्थक प्रयास है।

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मुख्यमंत्री के दिशा निर्देशों पर यह अभियान मानसिक स्वास्थ्य देखरेख अधिनियम-2017 और 24 जुलाई 2023 की अधिसूचना के प्रावधानों के तहत संचालित किया जा रहा है। अभियान का उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करना और नशा मुक्ति केंद्रों की पारदर्शिता एवं गुणवत्ता सुनिश्चित करना है।

 

स्वास्थ्य सचिव ने कहा कि प्रदेश में फिलहाल 133 मानसिक स्वास्थ्य संस्थान (जिसमें नशा मुक्ति केंद्र शामिल हैं) अनंतिम रूप से पंजीकृत हैं। अंतिम पंजीकरण से पहले इन सभी का स्थलीय निरीक्षण और दस्तावेज़ सत्यापन आवश्यक कर दिया गया है। Clinical Establishments Act-2010 के अंतर्गत पंजीकृत संस्थानों को भी अब मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम-2017 के तहत अंडरटेकिंग (Undertaking) देनी होगी, जिससे वे आवश्यक न्यूनतम मानकों का पालन सुनिश्चित करें।

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उन्होंने कहा हर जिले में पुनर्विलोकन बोर्ड को हर माह कम से कम एक बैठक आयोजित करनी होगी, ताकि निरीक्षण और निगरानी की प्रक्रिया निरंतर बनी रहे। वर्तमान में 7 जिलों में बोर्ड कार्यरत हैं, जबकि 6 अन्य जिलों में गठन प्रक्रिया प्रगति पर है। शासन ने निर्देशित किया है कि इन बोर्डों का गठन शीघ्र पूरा किया जाए।

स्वास्थ्य सचिव ने कहा राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण द्वारा यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि बिना वैध पंजीकरण संचालित नशा मुक्ति केंद्रों को चिन्हित कर उन पर आर्थिक दंड, कानूनी कार्रवाई और तत्काल बंदी की कार्यवाही की जाए। भविष्य में केवल वही संस्थान कार्यरत रहेंगे जो न्यूनतम चिकित्सा, प्रशासनिक एवं सामाजिक मानकों को सौ फीसदी पूरा करते हैं।