उत्तराखंड कांग्रेस की प्रभारी कुमारी शैलजा से कांग्रेस नेताओं को बड़ी उम्मीदें हैं। नई प्रभारी बनाई गई हैं तो बहुत कुछ नया होने का भरोसा जगा है। लोकसभा चुनाव से चंद महीने पहले किया गया ये बदलाव कितना कारगर होगा इसे लेकर अभी कुछ भी कहना मुश्किल है। शैलजा कोई सकारात्मक रिजल्ट के साथ उत्तराखंड नहीं आ रहीं हैं क्योंकि जिस छत्तीसगढ़ में वो प्रभारी थीं उस राज्य में जीता हुआ समझा जा रहा विधानसभा का चुनाव कांग्रेस के हाथ से फिसल गया। अब इस हार की समीक्षा हो पाती और प्रभारी की भूमिका की समीक्षा हो पाती उससे पहले ही उन्हें वहां से हटा कर उत्तराखंड भेज दिया गया है। छत्तीसगढ़ में अंदरखाने बतौर प्रभारी शैलजा की भूमिका पर कुछ सवाल उठे हैं। टिकट बंटवारे से लेकर सिटिंग विधायकों के टिकट काटने को लेकर कई नेताओं ने नाराजगी जताई है।
जिन विधायकों का टिकट काटा गया उन्होंने तो पार्टी के अंदरूनी सर्वे तक को फर्जी बताया है। अब सवाल यही है कि जहां कांग्रेस पूरी तरह मजबूत समझी जा रही थी, जहां सरकार वापसी की पूरी उम्मीद थी वहां आखिर कैसे बतौर प्रभारी शैलजा फेल हो गईं? सवाल ये भी है कि अब वो उत्तराखंड में कैसे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा पाएंगी जबकि 2 लोकसभा और 2 विधानसभा चुनाव हारने के बाद कांग्रेस पूरी तरह गुटबाजी में उलझी है? लोकसभा चुनाव ज्यादा दूर नहीं हैं ऐसे में वो ऐसा कौन सा मंत्र पढ़ेंगी जिससे कांग्रेस एकजुट हो जाए?
संतुलन कैसे साधेंगी?
कुमारी शैलजा के सामने सीनियर और नई लीडरशिप के बीच तालमेल बनाने की बड़ी चुनौती है। इस काम में देवेंद्र यादव पूरी तरह फेल हुए थे। यही वजह रही कि कांग्रेस 2022 में सत्ता हाथ से फिसलते हुए देखती रही। चुनाव से ठीक पहले हरीश रावत और चुनाव के नतीजों के बाद प्रीतम सिंह ने देवेंद्र यादव की भूमिका, कार्यशैली पर सवाल उठाए। प्रीतम सिंह ने तो उत्तराखंड में कांग्रेस को कमजोर करने का आरोप भी देवेंद्र यादव पर लगाया था। कुछ ऐसे ही सवाल अब छत्तीसगढ़ में कुमारी शैलजा पर उठ रहे हैं। मगर अब उत्तराखंड की स्थिति ये है कि करन माहरा, प्रीतम सिंह के गुट आमने सामने हैं। दोनों ओर से संगठन पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कसरत जारी है। प्रीतम सिंह के लिए शैलजा का आना कितना फायदेमंद होता है ये देखना बहुत दिलचस्प इसलिए भी है क्योंकि करीब 6-7 महीने दोनों नेताओं ने छत्तीसगढ़ में मिलकर काम किया है।
प्रीतम सिंह छत्तीसगढ़ में बतौर सीनियर ऑब्जर्वर काम कर रहे थे और शैलजा प्रभारी थीं। प्रीतम का कद कांग्रेस में इस वक्त बड़ा है और वो कोर ग्रुप का हिस्सा भी हैं। ऐसे में शैलजा और प्रीतम की जोड़ी नये समीकरण बनाने की पूरी कोशिश करेगी। दिल्ली और उत्तराखंड के बीच तालमेल बना रहे इसके लिए शैलजा का भरोसा प्रीतम सिंह पर रह सकता है। हालांकि छत्तीसगढ़ में दोनों का तालमेल कैसा रहा ये साफ नहीं है मगर जिस तरह प्रीतम सिंह ने हाल के दिनों में बयान दिए हैं उससे ये तो साफ है कि करन माहरा की रणनीति और उनके फैैसलों से वो बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखते। ऐसे में देखना होगा कि प्रभारी शैलजा इस मसले का समाधान निकाल पाती हैं या वो भी उलझी ही रह जाएंगी।
करन माहरा की परीक्षा
करन माहरा के सामने अब चुनौती ये है कि पार्टी में अपने खिलाफ उठ रही आवाजों का मुकाबला कैसे करें? देवेंद्र यादव के साथ उनकी नजदीकी इसलिए बढ़ गई थी क्योंकि प्रीतम ने देवेंद्र के खिलाफ मोर्चा खोला था। अब नई प्रभारी के साथ करन माहरा को नये सिरे से रणनीति बनानी होगी, करन की सबसे बढ़ी टेंशन ये भी है कि अब तक उनकी कार्यकारिणी नहीं बन पाई है। जो लिस्ट दिल्ली दरबार भेजी थी वो भी देवेंद्र यादव के साथ ही शायद गुम हो जाए। ऐसे में सवाल ये होगा कि आगे काम कैसे होगा? जबकि लोकसभा चुनाव बिल्कुल सिर पर हैं। संगठन में कई सवाल हैं, गुटबाजी किसी से छिपी नहीं है, करन माहरा जो चाहते हैं या जो कर रहे हैं उसके नतीजे अब तक उस हिसाब से दिखाई नहीं दिए हैं।
ऐसे में कुमारी शैलजा के साथ कितनी जल्दी सियासी समीकरण बना पाएंगे ये बड़ा सवाल है। गुटबाजी को लेकर शैलजा के सामने सवाल स्वाभाविक तौर पर उठेंगे ऐसे में करन की क्या भूमिका होगी और वो कैसे इस मसले को हैंडल करेंगे इस पर भी निगाहें रहेंगी। शैलजा खुद काफी अनुभवी तो हैं लेकिन उत्तराखंड की राजनीति का मिजाज़ कुछ अलग है और यहां की भौगोलिक परिस्थितियां भी अलग हैं, इन तमाम पहलुओं के बीच शैलजा कैसे काम करेंगी ये दिलचस्प होगा। उत्तराखंड में बीजेपी की रणनीति की काट देवेंद्र यादव नहीं तलाश पाए थे, छत्तीसगढ़ में शैलजा की रणनीति को बीजेपी ने धवस्त कर दिया था। ऐसे में आगे की राह इतनी आसान नहीं रहने वाली।
शैलजा और हरीश रावत
हरीश रावत उम्र के साथ सियासी तौर पर भी कमजोर हुए हैं। लगातार हार के बाद आलाकमान का भरोसा भी शायद उनपर कम हुआ है। हालांकि शैलजा के साथ वो मनमोहन कैबिनेट में काम कर चुके हैं। यानी दोनों एक दूसरे की कार्यशैली से वाकिफ हैं। ऐसे में उत्तराखंड की राजनीति में जब शैलजा प्रभारी बनके आ रहीं हैं तो हरीश रावत को लेकर उनका रुख क्या रहता है ये भी बड़ा सवाल होगा। सवाल इसके अलावा भी तमाम हैं।
एक धड़ा यशपाल आर्य का भी है जो कांग्रेस के अंदर अपने हिसाब से काम कर रहा है। यशपाल आर्य इन दिनों उस हिसाब से सक्रिय नहीं दिखाई देते जैसे वो बतौर प्रदेश अध्यक्ष रहते थे। अब देखना होगा कि क्या कुमारी शैलजा के आने से यशपाल आर्य भी पहले की तरह ही एक्टिव मोड में काम करेंगे? गणेश गोदियाल भी पूर्व प्रदेश अध्यक्ष हैं और राष्ट्रीय राजनीति में उनका भी कद बढ़ा है लेकिन सवाल ये है कि अब उत्तराखंड में वो किस तरह नई प्रभारी के साथ ताालमे बनाकर भविष्य की सियासी बिसात बिछा पाएंगे।फिलहाल तो इंतजार शैलजा के बता प्रभारी पहले उत्तराखंड दौरे का है। उससे ही आगे की सियासी दशा और दिशा तय होगी।

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