उत्तराखंड में विधानसभा सत्र और धामी सरकार के आखिरी बजट को लेकर कामरेड इंद्रेश मैखुरी ने तल्ख टिप्पणी की है। मैखुरी ने कहा कि उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने राज्यपाल के अभिभाषण के दिन ही बजट पेश करके ही दिखा दिया कि विधायी कार्यों के प्रति वह कतई गंभीर नहीं है बल्कि यह उसके लिए खानापूर्ति भर है

वित्त मंत्री के रूप में बजट पेश करते हुए मुख्यमंत्री के बजट भाषण का अच्छा-खासा हिस्सा वही है, जो वे आये दिन अपनी जनसभाओं में खुद की और सरकार की तारीफों के पुल बांधते हुए बोलते रहते हैं। मैखुरी ने कहा रोजगार को लेकर उत्तराखंड सरकार भले ही कितने बड़े-बड़े दावे क्यूं न कर ले, लेकिन हकीकत ये है कि सरकारी विभागों में रिक्त पदों को भरने के प्रति वो कतई गंभीर नहीं है। बजट दस्तावेज बता रहे हैं कि एक अप्रैल 2025 तक सरकारी विभागों, राज्य सरकार के सार्वजानिक उपक्रमों और राज्य सहायतित संस्थानों में कुल रिक्त पदों की 83637 है. बजट दस्तावेज बता रहे हैं कि रिक्त पदों की यह संख्या साल दर साल बढ़ रही है। मैखुरी ने कहा बजट भाषण में गांवों के विकास का दावा किया गया है, दावा है कि गांवों को मजबूत करके उत्तराखंड को मजबूत किया जा रहा है, गांवों के स्वावलंबन की राह खोली जा रही है. हकीकत यह है कि पर्वतीय क्षेत्र में गांव शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में निरंतर खाली हो रहे हैं, निर्जन हो रहे हैं. गांवों में स्थित सरकारी स्कूल लगातार बंद हो रहे हैं. क्लस्टर स्कूलों के नाम पर भी स्कूलों को बंद करने का ही सिलसिला चलाया जा रहा है। बजट में फसलों की घेरबाड़ के लिए बेहद मामूली धनराशि का प्रावधान किया गया है. हकीकत यह है कि पर्वतीय क्षेत्रों में जंगली जानवरों से न केवल फसल को बल्कि गांवों में रहने वालों के लिए भी गंभीर ख़तरा पैदा हो गया है. इस तरफ न तो आम दिनों में सरकार की दृष्टि जाती है, ना ही बजट में गयी। बजट भाषण में एप्पल मिशन की काफी चर्चा की गयी है लेकिन कुछ महीनों पहले ही राज्य में एप्पल मिशन से जुड़े किसानों ने सार्वजानिक रूप से प्रदर्शन करके बताया था कि तीन वर्षों में उन्हें सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी का भुगतान नहीं किया गया। बजट भाषण बता रहा है कि उत्तराखंड नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण (यूकाडा) को केंद्रीय उड्डयन मंत्रालय द्वारा एवियेशन ईको सिस्टम प्रोत्साहित करने वाले सर्वश्रेष्ठ राज्य का पुरस्कार दिया गया है. लेकिन आज ही के अखबार की ख़बरें बता रही हैं कि निजी ऑपरेटरों की मनमानी के चलते राज्य में अधिकांश हवाई सेवाएँ चल ही नहीं पा रही हैं। गौचर और चिन्यालीसौड़ में हवाई पट्टी बनाने के लिए दशकों पहले लोगों की उपजाऊ जमीनें ले ली गयी थी. बजट भाषण बता रहा है कि ये हवाई पट्टियां वायु सेना को हस्तांतरित करने का फैसला राज्य मंत्रिमंडल ने ले लिया है. इसका सीधा आशय यह है कि राज्य सरकार इन हवाई पट्टियों पर हवाई सेवा शुरू करने में ही नाकाम है और अब वायुसेना के हवाले होने के बाद आम जन को इन हवाई पट्टियों से हवाई सेवा का लाभ मिलने की आस छोड़ देनी चाहिए। बजट भाषण में केंद्र सरकार के एक सार्वजानिक उपक्रम द्वारा बनाई गयी जलविद्युत परियोजना को अपनी उपलब्धी के तौर पर पेश किया गया है. इससे प्रत्यक्ष और परोक्ष रोजगार का दावा किया किया गया है पर वह कितना है, इस पर बजट जैसे आंकड़ों के दस्तावेज में खामोशी है. बजट भाषण में कहा गया कि इनमें से एक परियोजना से राज्य को 12 प्रतिशत बिजली निशुल्क मिल रही है. सवाल है कि इस निशुल्क बिजली का लाभ राज्य के वाशिदों को क्यूँ नहीं मिल रहा है, उन्हें मंहगी दरों पर बिजली क्यूँ खरीदनी पड़ रही है ? प्रश्न यह भी है कि जब परियोजना उत्तराखंड की जमीन पर बन रही है, उससे होने वाले विस्थापन या जमीन जाने के नुकसान को यहां के लोग भुगतते हैं तो राज्य को भी सिर्फ 12 प्रतिशत बिजली ही क्यूँ निशुल्क मिलेगी और 88 प्रतिशत बिजली, परियोजना निर्माता कंपनी के मुनाफे के काम क्यों आएगी ? इंद्रेश मैखुरी ने कहा रिवर फ्रंट योजनाओं पर बजट भाषण में काफी जोर है. ये नदियों में सीमेंट-गारा भरने की परियोजनाएं हैं, जो नदियों को नष्ट करती हैं और ठेकेदारों के फायदे के लिए हैं

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