उत्तराखंड कांग्रेस में अचानक खलबली मची है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने राजनीति से 15 दिन के ब्रेक की घोषणा की है। हरीश रावत के इस फैसले को लेकर अब तरह तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। हरीश रावत ने सोशल मीडिया पर लिखा बिजली-पानी के दरें बढ़ाने के सरकार के इरादे के खिलाफ 1 घंटे के मौन व्रत के पश्चात, मैंने मां दुर्गा के सभी स्वरूपों की आराधना की और शांत मन से *अपने सार्वजनिक जीवन के 60 वर्षों की राजनीतिक यात्रा*
पर बहुत कुछ मनन किया और मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि इन 60 वर्षों की अथक यात्रा के बाद मुझे एक सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में अर्जित अवकाश लेने का अधिकार प्राप्त हो गया है और मैं अर्जित *अवकाश* की पहली किश्त के रूप में *15 दिन तक राजनीतिक सोच व राजनीतिक कार्यों से व्रत रहूंगा* ।
हां, इस दौरान मंदिरों में पूजा-अर्चना, कुछ ईद मिलन व मांगलिक समारोह में अवश्य भाग लूंगा और इन *15 दिनों में मैं अपनी जीवन यात्रा के उन प्रसंगों और मोड़ों को उकेरने की कोशिश करूंगा,* जो समय के साथ बहुत नीचे कहीं चले गए हैं।
हरीश रावत के मन में क्या है?
हरीश रावत भले ही 60 साल की सेवा का हवाला देकर सियासी व्रत या छुट्टी की बात कर रहे हों लेकिन उनके इस कदम के भी मायने निकाले जा रहे हैं। सवाल है कि आखिर इसकी जरूरत क्यों पड़ी? ये हकीकत में सियासी ब्रेक है या इसके पीछे का मकसद कुछ और है? फिलहाल हरदा के फैसले से कांग्रेस खेमे में खलबली मची हुई है।

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