इगास बग्वाल पर्व तीर्थ नगरी ऋषिकेश में भी पारंपरिक रूप से मनाया गया। देर शाम विभिन्न मंचो के संयुक्त तत्वावधान में इगास कार्यक्रम का आयोजन ऋषिकेश में किया गया।
इस दौरान लोक संस्कृति की सप्तरंगी छटा भी बिखरी। ढोल-दमाऊ, मसक बाजा, तूरी, रणसिंघा आदि लोक वाद्ययंत्रों ने सभी को उल्लास से भर दिया और हर कोई झूमते-नाचते भैलो खेलने लगा। साथ ही लोक व्यंजनों की खुशबू से भी पूरा वातावरण महकता रहा। दरअसल गढ़वाल में दीपावली के 11 दिन बाद यानी देवोत्थान एकादशी को इगास बग्वाल पर्व मनाया जाता है।

इगास का एतिहासिक महत्व
बता दें कि इगास पर्व का सीधा संबंध वीरभड्ड माधो सिंह भंडारी की वीर विजय गाथा से जुड़ा है। 16 वीं शताब्दि में दापाघाट के युद्ध मे गढ़वाल की सेना द्वारा तिब्बती सेना को पराजित किया गया था। तिब्बत पर विजय होकर लौटी गढ़वाल की सेना के उपलक्ष मे इस त्यौहार को हरषोउल्लास के साथ मनाया जाता है। जिस वक्त ये युद्ध चल रहा था उस वक्त दीपावली का त्यौहार था ओर गढ़वाल की सेना युद्ध मे लगी थी दिवाली के ठीक 11 दिन बाद वीरभड्ड माधो सिंह के नेतृत्व में गढ़वाल की सेना तिब्बत पर विजय होकर लौटी। जिसके बाद सभी घरों में दिवाली इगास पर्व के रूप में धूमधाम से मनाई गई।
80 वर्षीय महिला रही आकर्षण का केंद्र
इस पूरे कार्यक्रम के तहत 80 वर्षीय बुजुर्ग महिला शांति देवी ने भैलो को पूरे कलात्मक तरीके से शरीर के चारों ओर घुमाया,जो कि आकर्षण का केंद्र बना रहा।

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