उत्तराखंड के सीनियर नेता हरीश रावत ने अपने मुख्यमंत्री बनने और उसके बाद के घटनाक्रम पर हैरान करने वाली बातें साझा की हैं। हरीश रावत ने ये भी बताया है कि 2014 में वो सीएम नहीं बनना चाहते थे लेकिन कुछ ऐसा हो गया कि वो आलाकमान को मना नही कर पाए। हरीश रावत ने ये भी बताया है कि कैसे सीएम का पद संभालने से पहले ही उन्हें चेतावनी मिल गई थी लेकिन जो हुआ वो सब अचानक हुआ। हरीश रावत के मन में आज मलाल भी है और बहुत सारे सवाल भी हैं।
24 अक्टूबर 2023 से अब तक
हरीश रावत ने लिखा है यूं कहूं तो 24 अक्टूबर की मध्यरात्रि का सबक! सार्वजनिक जीवन के व्यक्ति बहुधा अपनी मानसिक जकड़न के शिकार होते हैं। 23 अक्टूबर को पौड़ी के राठ महाविद्यालय में एक महत्वपूर्ण विवाह समारोह था और उतना ही महत्वपूर्ण विवाह समारोह 24 अक्टूबर को हल्द्वानी में आयोजित हुआ। अपनी सामाजिक सोच और विचार के जकड़न में मेरे लिए आवश्यक था कि मैं यदि एक विवाह समारोह में जाऊं तो फिर दूसरे विवाह समारोह में भी अवश्य पहुंचूं, दूरी मेरे लिए बहाना नहीं बन सकती थी! पौड़ी से आने के बाद जब हल्द्वानी को प्रस्थान करने लगे तो मेरे दो सहयोगियों ने जिनको मेरे साथ यात्रा करनी थी, कहा कि आप बहुत थक गये होंगे!
मैंने उनसे कहा नहीं, हमें चलना ही है। गौलापर, हल्द्वानी हमारा कर्म क्षेत्र भी है, बहुत सारे सामाजिक दायित्व मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। सुख और दुःख, दोनों में भागीदारी सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है और रात 11:30 बजे जब विवाह समारोह स्थल से निकला तो अपना लक्ष्य रात्रि विश्राम का काशीपुर रखा था। हम काशीपुर की तरफ चल पड़े। ऐसा लगता है कि दुर्घटना भी लिखी हुई थी और बचाने वाला भी उतने ही मुस्तैदी से बचाने पर लगा हुआ था। हल्द्वानी से प्रस्थान करते वक्त मेरे दिमाग में अचानक यह आया कि ज्यादा यात्रा कर रहा हूं तो मुझे गले में कॉलर पहनना चाहिए, जिसको मैं अब लगभग पहनना भूल ही गया हूं और उस दिन भी जब मैं विवाह समारोह से काशीपुर की तरफ को प्रस्थान किया तो मैंने पूरन से कहा कि पूरन वह कॉलर दो और मैंने कॉलर पहन लिया, जो मेरे बचाव का एक बड़ा कारण बना। खैर मैं गाड़ी के चलने से पहले अपनी सीट बेल्ट लगा लेता हूं और लगभग 12:15 बजे बाजपुर में सीमेंट के कांक्रीट से बने हुये डिवाइडर से हमारी गाड़ी टकरा गई। गाड़ी में बैठे मेरे सहयोगी ड्राइवर से थकान की बात कर रहे थे, उनमें से दो लोगों ने ऑफर किया कि हम गाड़ी चलाएंगे, शायद ड्राइवर मेरे आदेश की प्रतीक्षा कर रहा था। मैं यह भूल गया कि ड्राइवर की सुरक्षा ही मेरी और मेरे सह यात्रियों के सुरक्षा की गारंटी है। मैंने यूं ही हास्य-परिहास में अपने सुरक्षा अधिकारी से कहा कि यार यह ट्रैक्टर नहीं है, यह फॉर्च्यूनर गाड़ी है, उसके गाड़ी चलाने की क्षमता पर मजाक की और इस मजाक के साथ 7-8 मिनट के बाद बाजपुर रेलवे फाटक के पास यह दुर्घटना घटित हो गई। सामने गलत दिशा से अपने को मोड़ रहे एक छोटे हाथी की लाइट से बचने के लिए या थोड़ी सी सावधानी या थोड़ी सी नींद की झपकी का परिणाम था कि अरे-अरे, रे-रे के साथ हमारी गाड़ी पूरी तरह से टकरा गई और टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि मेरे बास्केट के जो तीन बटन नीचे के लगे हुए थे, तीनों बटन टूट गए और एक बटन तो अपने साथ कुछ कपड़ा भी जिस पर वह टाका गया था, उसको नोच दिया। ड्राइवर को एकदम स्टेरिंग पर सर भेड़े हुए देखकर मुझे लगा कि ड्राइवर बेहोश हो गया है या खत्म हो गया है। मेरी छाती और पेट में अत्यधिक दबाव कुछ क्षण के लिए आया था जो हटा और मैंने सीट बेल्ट खोली, गाड़ी से नीचे उतरा और पीछे देखा जो लोग मेरी सुरक्षा को लेकर चिल्ला रहे थे, आप ठीक हो साहब, आप ठीक हो तो उनको मेरी चिंता थी लेकिन उनको खुद भी छोटें लगी, फैक्चर भी हुए। खैर नीचे उतरा, बहुत सारे लोग गाड़ी के एक्सीडेंट के ओर आ गये, पहचान भी लिया, सहारा देने के लिए भी लोग आगे बड़े, अस्पताल ले चलने के लिए किसी ने अपना स्कूटर, किसी ने अपनी मोटर साइकिल ऑफर की, हॉस्पिटल भी गया। लेकिन एक बात जो मेरे ध्यान में आयी कि अभी सोशल मीडिया पर मेरे गाड़ी की दुर्घटना का चित्र छपेगा तो मेरे कुटुंबीजन, मेरे बच्चे, मेरे मित्र व सहयोगी सब चिंतित होंगे। मैं दुर्घटनाग्रस्त हुआ हूं मगर सकुशल हूं इसके चलते हुए मैंने एक ट्वीट/वीडियो डाल दिया, जिसने मध्य रात्रि तक, जब तक हमारे लोगों तक यह समाचार पहुंचा उनके लिए एक भरोसे का काम किया, पुलिस प्रशासन मुझे काशीपुर PVR अस्पताल लेकर के गया, वहां प्रारंभिक जांच हुई जिसमें कोई चिंताजनक पहलू सामने नहीं आया। लेकिन उन्होंने ड्रिप में पेन कलर इंजेक्ट किया जिसके प्रभाव स्वरूप 24 अक्टूबर का शेष टाइम ठीक से गुजर गया और 25 अक्टूबर को हिमालयन हॉस्पिटल जौलीग्रांट देहरादून में भर्ती हो गया। जौलीग्रांट हिमालयन हॉस्पिटल के लोगों ने पूरी शक्ति लगाकर MRI से लेकर हर तरीके की जांच की, LV1, LV2 में दो हेयरलाइन फैक्चर और कुछ चोटों के अलावा दो पसलियों के टूटने और कुछ पसलियों के रगड़ खाने और कुछ छाती में दबाव और शरीर के कुछ और हिस्सों में जिसमें पांव भी सम्मिलित है, उनमें चोट आदि की बात रिपोर्ट में सामने आयी। प्रियजन, मित्रगण बड़ी संख्या में रात को भी पहले काशीपुर, फिर जौलीग्रांट देहरादून पहुंच गये, हिमालयन हॉस्पिटल में दो दिन एडमिट रहा। हॉस्पिटल तंत्र चाहता था कि मैं एक-दो दिन और वहीं विश्राम करूं। लेकिन मैंने देखा कि मेरा विश्राम हॉस्पिटल के लिए ज्यादा महंगा साबित हो रहा है, भीड़-भाड़ से बहुत सारी दिक्कतें खड़ी होने लग गई थी, लेकिन मैंने अपने अनुरोध पर कि मैं घर जाकर के पूरी तरह से बेड रेस्ट करूंगा, इस वादे के साथ अपने निवास पर आ गया।
तीन दिन बाद फिर चेकअप कराने के लिए जौलीग्रांट हिमालयन हॉस्पिटल पहुंचा, एक-दो दिन बाद कुछ माइनर प्रॉब्लम छाती और पसलियों आदि में बड़ी पीड़ा का महसूस होने पर मैं आरोग्यधाम हॉस्पिटल अपने सर्व उपलब्ध डॉ. विपुल कंडवाल जी के वहां भी पहुंचा और वहां भी स्क्रीनिंग व एक्स-रे करवाया, सारा फोकस चोटों और चोटों से जो दर्द था, हड्डी टूटे उतना दर्द नहीं जितना पसलियों के टूटने पर होता है, अत्यधिक पीड़ा जनक स्थिति थी, उसमें मैं इस बात को बिल्कुल विस्मृत कर गया कि मेरे पेट और पाचन तंत्र में भी कुछ समस्याएं उठ कर के खड़ी हो रही हैं। तीन दिन तक प्रबल वोमिटिंग टेंडेंसी से लड़ने के बाद मैंने फैसला लिया कि मैं मैक्स हॉस्पिटल जाकर एक बार फिर से अपना चेकअप करवाऊं क्योंकि मैक्स हॉस्पिटल के डॉ. ए.के. सिंह जी ने जब मेरी गर्दन 2014 में टूटी थी तो उस समय एम्स के बाद जो आफ्टर मेडिकल केयर थी वह उनकी ही देखरेख में आगे बढ़ी थी तो मुझे लगा कि कुछ न्यूरो संबंधी प्रॉब्लम हो सकती है तो मैं उनके पास जाऊं, जांच के बाद उन्होंने कहा कि कोई न्यूरो संबंधी प्रॉब्लम तो नहीं है लेकिन हमें आपकी एंडोस्कोपी करवानी पड़ेगी और कुछ जांचें लीवर, किडनी आदि को लेकर के करनी पड़ेंगी, 6 दिन मैक्स में भर्ती रहने के बाद मुझे निरंतर यह आभास होता रहा कि मैं हॉस्पिटल के ऊपर थोड़ा भार भी बन रहा हूं, अनंतोगत्वा उनके एक-दो दिन और भर्ती रहने के आग्रह के बावजूद मैं 24 नवंबर को अर्थात एक माह बाद अपने आवास लौटा।
2014 से 2024 तक का सफर
हरीश रावत ने आगे लिखा है जीवन की प्रत्येक चुनौती में मुझे आपकी सद्भावना ने उबारा। 24 अक्टूबर की यह सड़क दुर्घटना भी प्राण घातक हो सकती थी और आज भी मैं दुर्घटना के कई कुप्रभावों से पूरी तरह से ग्रस्त हूं। इस एक माह के दौरान मैं और मेरा शरीर कई उथल-पुथलों से गुजरा है। पहली बार मुझे जीवन में थोड़ा एंजायटी बोथ का आभास हुआ। मध्य रात्रि को नर्स बहनें दवाइयां देती थी लेकिन फिर नींद का आना कठिन हो जाता था। रात्रि के उन एकान्त क्षणों में मैं कभी इस दुर्घटना और उसके संभावित परिणामों पर सोचता और कभी मेरा मन दूर 2014 में भ्रमण करने लगता था। 2014 में मेरे सम्मुख उत्तराखंड राज्य के मुख्यमंत्री पद संभालने का नेतृत्व का संदेश आया। 
2014 से 2024 अब आने को है, इस दौर में इतने उथल-पुथल भरे घटनाक्रम मेरे वैयक्तिक और सार्वजनिक जीवन में आये हैं, जो कभी-कभी मुझे यह सोचने को मजबूर कर देते हैं कि मैंने मुख्यमंत्री पद की आकांक्षा पाल कर या उत्तराखंड राज्य के मुख्यमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद की ओर कदम बढ़ाकर गलती तो नहीं की! जीवन के विषय में मेरी एक दासविक धारणा है कि मैं अपने शरीर की ताकत के अनुसार कल्पना नहीं करता हूं बल्कि मैं मन के साहस के अनुरूप आगे के चुनौती के विषय में सोचता हूं और मेरा मानना है कि आपमें कितना साहस है जीवन में यह तथ्य ज्यादा मायने रखता है। मगर आज ये जीवन के लगभग संध्या काल में अपने आपको जीवन रूपी यात्रा के आखिरी छोर पर खड़ा पाता हूं और आगे कैसे रास्ता बनेगा इसकी उपापोह से ग्रस्त हो जाता हूं तो फिर मैं उस आकाश की ओर देखता हूं जो मेरे सामने फैला हुआ है। फिर मैं उस सड़क का भी विहंगम विवेचन करता हूं जिसमें मेरे जीवन में कई महत्वपूर्ण मोड़ आए, कई अवसर आए, कुछ चुके, कुछ सपने देखे व बिखरे, कुछ इच्छाएं मारनी पड़ी, कभी-कभी मन यह सवाल करने लगता है कि अपनी जिंदगी तुमने कुछ ऐसा पाया जो आपको कुछ सुकून दे सके या केवल परिस्थितियों के हाथ का खिलौना बनकर रह गये। मुझे इस बात का कभी गुमान नहीं रहा है कि मैं परिस्थितियों को बनाने की क्षमता रखता हूं, मगर मैं परिस्थितियों से भिड़ा जरूर हूं। इस एक माह के दौर में भी मैं भिड़ा हूं और 2014 से आज तक की यात्रा के इस उत्तराखंडी सोपान के दौरान भी भिड़ा हूं। कल रात अचानक नींद खुली और कुछ भूख भी लग गई। खैर सब गहरी निंद्रा में थे धीरे-धीरे एक डेढ़ घंटे यूं ही सोच के आकाश में विचरण करते मुझे भी नींद आ गई। लेकिन उस विचरण के दौरान मैंने यह पाया कि जीवन में सब कुछ मीठा-मीठा ही नहीं होता है, सब कुछ सरल भी नहीं होता है। इसलिए इस चुनौती पूर्ण सोपान को भी मुझको उसी रूप में ग्रहण करना चाहिए जिस रूप में नियति और प्रकृति मुझे स्थितियों को ग्रहण करने के लिए कह रही है। भयंकर आपदा ग्रस्त राज्य का मुख्यमंत्री बनना भी अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती थी। 2014 में जब मैंने पार्टी हाई कमान के संदेश को अपनी पत्नी के साथ साझा किया तो उन्होंने मुझसे एक बात कही कि दिल्ली एक अनंत आकाश है, इसके साथ पूरा देश जुड़ा हुआ है, आप देश की राजनीति में स्थापित हो चुके हो, पार्टी में भी स्थापित हो चुके हो, सरकार में स्थापित हो चुके हो और दिल्ली में रहोगे तो फिर अवसर आते रहेंगे, हो सकता है आगे चुनाव इतना सरल न हो लेकिन राजनीति में आप मुकाम बनाते रहोगे और एक सहज, सरल, उद्देश्यपूर्ण जीवन हमेशा आपके सामने रहेगा जिस पर आपको, हमको और बच्चों को, हम सबको गर्व होगा। उन्होंने कहा कि आप उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बन रहे हो जैसा आपका कथन है, मगर एक बात याद रखिएगा कुछ लोगों से अवसर छीन रहे होंगे जो इन पदों पर आज विराजमान हैं। आज स्पष्ट तौर पर एक बटी हुई पार्टी के मुख्यमंत्री बनोगे और वह भी ऐसी पार्टी जो दैवीय आपदा को झेलने में पूरी तरीके से विफल साबित हो चुकी है जिसके लिए इस समय उत्तराखंड के जन मानस में भयंकर नाराजगी दिखती है। जिस समय आपको एक जुटता की सबसे अधिक आवश्यकता होगी, उस समय आपको झगड़े-झगड़े, बंटवारे-बंटवारे, षड्यंत्र षड्यंत्र ही मिलेंगे। मुख्यमंत्री पद एक महत्वपूर्ण पद है और मैं समझती हूं कि आप 2001 से लेकर 2012 के आस-पास तक आप इसकी कामना भी कर रहे थे और यह प्राप्त हो इसके लिए निरंतर प्रयत्नशील भी थे। आपके निर्णय के प्लस और माइनस दोनों हैं, मगर जो कुछ करिए, हिम्मत के साथ करिए और पूरी दुष्चिंता को एक तरफ रख करके निश्चित भाव से देहरादून जाइए और चुनौती को ग्रहण करिये और यदि कहीं कोई हिचकिचाहट है तो माननीय सोनिया जी और माननीय राहुल जी को धन्यवाद दीजिये और उनसे क्षमा मांग लीजिए। मैंने घर से प्रस्थान तो क्षमा मांगने के लिए किया लेकिन सोनिया जी के सामने जाते ही धन्यवाद के शब्द मुंह से निकल गये और उन्होंने मुझसे बहुत साफ तौर पर कहा कि हरीश हम जानते हैं बहुत कठिन है और पार्टी के लिए अत्यधिक चुनौतीपूर्ण है, हमको तुमसे और किसी बात की अपेक्षा नहीं है, केदारनाथ के महत्व को भी आप समझते हो, उत्तराखंड के महत्व को भी आप समझते हो, जिस तरीके से हमारी आज की सरकार की विफलता सामने आई है उसको भी तुम समझते हो, प्राण लगाकर के भी पुनर्वास और पुनर्निर्माण के काम को तुम्हें संपादित करना है।
किसी चुनाव के परिणाम की, किसी बात की चिंता अपने मन में मत रखना और पूरी शक्ति लगाकर इस काम को अंजाम दो। उनके शब्दों ने मेरा कर्तव्य पथ निर्धारित कर दिया था खैर में देहरादून आया, यहां पार्टी में कुछ उथल-पुथल भी हुई, चाहतें और मतभेद भी सामने आये। मगर अनंतोगत्वा दो-तीन बार शपथ ग्रहण का समय बदलने के बाद मैंने शपथ ग्रहण की, अपने सहयोगियों के साथ और सहयोगी पहले निर्धारित हो गए थे। क्योंकि मुझको एक काम विशेष सौंपा गया था, मंत्री कौन बनेंगे, किसके पास क्या विभाग रहेंगे यह निर्णय पार्टी ले चुकी थी और मैंने उस पर कोई दखल अंदाजी नहीं की। शपथ ग्रहण हुआ, शपथ ग्रहण के समय को लेकर के यह जरूर कहा गया कि आगे का समय बहुत उथल-पुथल पूर्ण होगा। उस समय मुझे इस बात का दूर-दूर तक भी आभास नहीं था कि मेरी जिंदगी एक अत्यधिक कष्टपूर्ण समय के निकट आ रही है।




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