पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने टिहरी के विस्थापितों का दर्द साझा किया है और उनके साथ खुद को जोड़ा है। हरीश रावत ने लिखा है टिहरी एक बार फिर संघर्ष मांगता है। इस बार पथरी में बसे हुये जो टिहरी के विस्थापित हैं उनकी पीढ़ियां बीत रही हैं, दूसरी पीढ़ी भी अब बुजुर्ग होने जा रही है और अभी तक जिस जमीन पर उनको बसाया गया है, बल्कि उनकी जमीन लेकर के बसाया गया है यूं ही नहीं बसाया गया है और अभी तक उस भूमि का भूमिधरी का अधिकार उनको नहीं है।
उस जमीन के आधार पर वह अपना कोई बिजनेस करना चाहें, कहीं से कर्ज लेना चाहें, आज बहुत सारी फैसेलिटीज हैं उनका लाभ उठाना चाहें तो वह लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। वह एक प्रकार से मालिक नहीं है, केवल किसी के केयर टेकर के तौर पर काम कर रहे हैं। जमीन को काम करके खा रहे हैं इतना ही उनका अधिकार है। सुविधाएं हैं, लेकिन सुविधाएं तो काम करने वाले को भी दी जाती हैं, मालिक-मालिक होता है तो वह उनकी जमीनें ली हैं, उनको मालिकाना हक मिलना चाहिए, यह 2016 में तत्कालीन सरकार की कैबिनेट का फैसला था और यह मामला विधानसभा में भी उठा है, आज की विधायक ने उठाया है, उसके बाद सर्वेक्षण इत्यादि के नाम से मामले को उलझाने की कोशिश हो रही है। इसमें सीधा-सीधा मामला है जिसके पास जो जमीन है, जिस जमीन पर वह काबिज है उसका मालिकाना हक उसके नाम पर होना चाहिए और जो बाकी जमीन है, जो उस क्षेत्र में आती है, विस्थापितों के अलग-अलग हिस्से हैं जो उनके हिस्से में जमीन आती है, वह जमीन जो है उस ग्राम सभा की, जिस ग्राम सभा का नाम है उस ग्राम सभा की जमीन मानी जानी चाहिए और इसलिये तत्कालीन सरकार ने 2015-16 में उसकी हदबंदी भी करवाई थी, पूरी एरिया की बाउंड्री बना दी गई है तो आज कहां से नए-नए कागज, अभिलेखों को खोज कर के मामले को उलझाया जा रहा है, टिहरी के लोगों को डराने का काम किया जा रहा है तो यह चीजें स्वीकार्य नहीं हैं।
आंदोलन के लिए तैयार- हरीश रावत
आज मेरे पास टिहरी के कुछ भाई मिलने के लिए आए थे महावीर रावत जी के नेतृत्व में और उनकी विधायक Anupama RAWAT ने भी मुझे बहुत सारी बातें बताई थी, इसलिए मैंने उनसे कहा है कि यदि आप चाहो तो मैं, इस मामले को मुख्यमंत्री जी के सम्मुख भी उठाऊंगा, लेकिन इसको जो है जनता की अदालत में भी लेकर के जाएंगे। टिहरी ने बलिदान दिया है, 30 तारीख को गांधी जी का बलिदान दिवस है, सहिष्णुता के लिए गांधी निछावर हो गए, हथियारों की हत्या के शिकार हुए, गांधी जी की हत्या हुई, तो यह टिहरी के लोगों के अरमानों की हत्या हो रही है, यदि टिहरी के लोग तय करेंगे तो हम उनके साथ संघर्ष में खड़े होंगे।

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