अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी उत्तराखंड के पहाडों में हांफने लगी है। 2022 विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड में तीसरा विकल्प बनकर सरकार बनाने का दावा करने वाली आप आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। विधानसभा में बुरी हार के बाद आम आदमी पार्टी उभर ही नहीं पाई। दूसरे दल लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटे हैं और आम आदमी पार्टी उत्तराखंड में डेढ़ साल से अपना प्रदेश अध्यक्ष तक नहीं बना पाई है। इससे साफ है कि इस पहाड़ी राज्य को लेकर शायद केजरीवाल अब हार मान चुके हैं। आप को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल चुका है लेकिन राज्यों में लगातार खराब होती उसकी हालत पार्टी लीडरशिप पर कई सवाल खड़े कर रही है।
उत्तराखंड में कैसे बढ़ेगी आम आदमी पार्टी?
उत्तराखंड आप की यूनिट में पहले से ही कमजोरी है। सियासत का कोई भी बड़ा चेहरा आम आदमी पार्टी अपने साथ नहीं जोड़ पाई। जमीनी स्तर पर कुछ काम करने वाले लोग हैं भी तो आपसी कलह की वजह से उन्हें भी आगे बढ़ने का मौका नहीं मिल रहा। आलाकमान वाले कल्चर की वजह से लोकल लीडरशिप बन ही नहीं पाई या बनने ही नहीं दिया गया। जिस नेता को आप ने सीएम कैंडिडेट बनाया था वो अजय कोठियाल चुनाव खत्म होते ही बीजेपी में शामिल हो गए और अब बीजेपी के प्रवक्ता हो गए हैं।
विधानसभा चुनाव की हार के बाद जिन दीपक बाली को प्रदेश अध्यक्ष बनाया वो भी दो महीने बाद ही बीजेपी में शामिल हो गए तब से केजरीवाल को उत्तराखंड में कोई एसा नेता नहीं मिला जिसे संगठन की कमान सौंपी जा सके।
प्रभारी और सह प्रभारी भी हवा हवाई!
आम आदमी पार्टी ने दिनेश मोहनिया को हटाकर पंजाब के विधायक बरिंदर गोयल को उत्तराखंड का प्रभारी जबकि दिल्ली के विधायक रोहित मेहरौलिया को सह प्रभारी बनाया। इन दोनों नेताओं ने देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंहनगर और हल्द्वानी तक ही खुद को सीमित रखा। कुछ बैठकों में शामिल होकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली। जबकि उत्तराखंड में असली राजनीति पहाड़ की है और पहाड़ में जड़ें मजबूत किए बिना संगठन खड़ा करना नामुमकिन है।
बताया जाता है कि आप की कई बैठकों में इसे लेकर बात भी कुछ नेताओं ने रखी लेकिन ना तो प्रभारी ने तवज्जो दी और नाही दिल्ली दरबार ने दिलचस्पी ली, इन हालात में पार्टी कैसे मजबूत होगी इसका जवाब तलाशना ज्यादा मुश्किल नहीं है। आम आदमी पार्टी अगर इसी सुस्त रफ्तार से काम करती रही तो उत्तराखंड में उसका सपना शायद ही कभी पूरा हो पाए प्रभारी और सह प्रभारी के भरोसे केजरीवाल ने पूरे उत्तराखंड को छोड़ दिया है मगर कोई प्रदेश अध्यक्ष नहीं है, ऐसे में कार्यकर्ताओं में भी उलझन है कि काम करें तो कैसे?
संगठन समन्वयक जोत सिंह बिष्ट नाराज़?
2022 विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस छोड़कर आम आदमी पार्टी में शामिल हुए सीनीयर नेता जोत सिंह बिष्ट भी अज्ञातवास पर चले गए हैं। बताया जा रहा है कि बीते कुछ दिनों से ना तो वो पार्टी दफ्तर आ रहे हैं और नाही पार्टी की किसी गतिविधि में शामिल हैं। इतना ही नहीं जोत सिंह बिष्ट से किसी से संपर्क भी नहीं हो पा रहा है।
ऐसे में सवाल ये है कि क्या जोत सिंह बिष्ट नाराज़ हैं? क्या संगठन समन्वयक होने के बावजूद आम आदमी पार्टी में उनके सुझावों पर अमल नहीं किया जा रहा? अगर ऐसा है तो क्या जोत सिंह बिष्ट आप को अलविदा कह देंगे? ऐसे कई सवाल हैं जिन्हें लेकर आप में उलझन है। जोत सिंह बिष्ट का 40 साल से ज्यादा सियासी अनुभव है और संगठन के लिहाज से उन्हें काफी मजबूत माना जाता है। इसीलिए जब वो आप में शामिल हुए तो उन्हें संगठन समन्वयक भी बनाया गया लेकिन पार्टी की आपसी कलह के चलते उन्हें काम करने कि मौका ही नहीं मिला। इन हालात में आप उत्तराखंड में कैसे मजबूत हो पाएगी या अपना अस्तित्व बचा पाएगी इसे लेकर सवाल उठना लाजिमी है।
जातिगत समीकरणों की अनदेखी!
उत्तराखंड की राजनीति में जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों का बड़ा अहम रोल रहता है। संगठन हो या सरकार हर पार्टी जातीय संतुलन साधने पर पूरा फोकस करती है। कांग्रेस में भी ये मुद्दा कई बार उठा है क्योंकि मौजूदा वक्त में प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष दोनों कुमाऊं से हैं। जिसे लेकर गाहे बगाहे कांग्रेसी आवाज उठाते रहते हैं। दूसरी ओर बीजेपी ने कुमाऊं के राजपूत को मुख्यमंत्री बनाया है तो गढ़वाल के ब्राह्मण को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। जबकि आम आदमी पार्टी पर इन समीकरणों को नजरअंदाज करने का आरोप है। बताया जाता है कि आप छोड़ चुके कई नेताओं ने पार्टी में रहते हुए ये मुद्दा उठाया था लेकिन उस पर ध्यान नहीं दिया गया। यही वजह है कि आप का बेस उत्तराखंड में बन ही नहीं पाया। मौजूदा दौर में भी आम आदमी पार्टी उलझी हुई है। उत्तराखंड में आम आदमी पार्टी जब से आई तब से लेकर अब तक एक भी राजपूत अध्यक्ष नहीं बनाया गया जबकि उत्तराखंड में राजपूतों की आबादी करीब 35 फीसदी है और पहाड़ में इन समीकरणों के कई मायने भी होते हैं। इसके बाद भी आलाकमान ना तो किसी के सुझावों पर ध्यान देता है और ना ही किसी की बात को तवज्जो देता है। ऐसे में सवाल यही है कि आम आदमी पार्टी क्या उत्तराखंड में जल्द ही इतिहास का हिस्सा बन जाएगी या गलतियों से सीख कर कोई सुधार करेगी?

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