20 February 2026

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धामी के बजट पर हरदा का तंज

धामी के बजट पर हरदा का तंज

धामी सरकार के बजट को पूर्व सीएम हरीश रावत ने आंकड़ों की बाजीगरी और कर्ज का बोझ बढ़ाने वाला करार दिया है। पूर्व सीएम ने कहा कि राज्य के दो हसीन चेहरे पुष्कर सिंह धामी और प्रेमचंद अग्रवाल की कृति बजट 2024-25 उतना कहीं से भी हसीन नहीं दिखाई देता है। केंद्र वित्त पोषित योजनाओं और वाह्य सहायता आधारित योजनाओं से फुलाया गया बजट के लिफाफे में यदि राज्य का नौजवान, किसान, गरीब और महिला तथा मजदूर कुछ खोजना चाहे तो उनको अपने लिए कुछ भी नजर नहीं आएगा! 89000 करोड़ रुपए से ज्यादा का बजट प्रस्ताव में आधे से अधिक राशि अर्थात लगभग 27,000 करोड़ रूपया राज्य द्वारा पहले लिए गए कर्ज की अदायगी और ब्याज की अदायगी में चला जाएगा, लगभग 26000 करोड़ रुपए से कुछ ज्यादा राशि कर्मचारियों के वेतन भुगतान, अर्द्ध सरकारी कर्मचारियों के वेतन भुगतान, पेंशन भुगतान आदि पर व्यय होंगे।

सरकार सिर्फ ढोल बजा रही- हरीश रावत

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि जिन क्षेत्रों में लंबी छलांग की बात कही जा रही है उदाहरण के लिए उनमें से एक क्षेत्र पर्यटन, पर्यटन की मद में 100 करोड़ रूपया और ढोल देहरादून से दिल्ली तक बजाया जा रहा है। जरा पीडब्ल्यूडी विभाग का बजट देखिए जितना 2016 के बजट में प्रावधान था उसी के समकक्ष प्रावधान 2024 में भी है, तो सड़कें गड्ढा युक्त नहीं होंगी तो क्या गड्ढा मुक्त बनेंगी? ढांचागत विकास के क्षेत्र के लिए जो प्राविधान किए गए हैं उनमें सोच और कल्पना का समन्वय नहीं दिखाई देता है। गैरसैंण को सरकार 20 करोड रुपए से राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाना चाहती है, जबकि 20 करोड रुपया तो वहां सड़क, बिजली-पानी आदि क्षेत्रों में जो व्यय निश्चित है उसके लिए ही पर्याप्त नहीं है।

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कर्मचारियों के हाथ भी खाली- रावत

हमारे राज्य की संगठित महिला शक्ति, महिला मंगल दल, महिला स्वयं सहायता समूह, आशा बहनें, आंगनवाड़ी, भोजन माताएं, महिला समाख्या आदि के लिए बजट में ठन-ठन गोपाल है। उत्तराखंड के सबसे ज्यादा भयावह समस्या पलायन पर भी बजट मौन है, अन्य कारणों का निदान का संकेत नहीं भी देते तो रहे-सहे लोग जो जंगली पशुओं के आतंक से पलायनित हो रहे हैं उनके लिए भी कुछ शब्द कहने में बजट ने परहेज किया है। रोजगार सृजन के लिए दावा लाखों का, मगर बजट में सरकार द्वारा स्वयं घोषित 63000 रिक्त पड़े पदों को भरने का रोड मैप गायब है। राज्य की संगठित युवा शक्ति के प्रतीक उपनल कर्मी, अतिथि शिक्षक और अंशकालिक कर्मचारियों के भविष्य को लेकर बजट में कोई संकेत नहीं है। नए जिलों की चाह रखने वालों के लिए भी इस बजट में सांत्वना का कोई शब्द नहीं है। वृद्धजन, जिसमें OPS के तहत आए पूर्व कर्मचारी भी सम्मिलित हैं उनके लिए भी कोई संकेत सूचक शब्द इस बजट में नहीं है। नए आय के श्रोत क्या हैं ? शायद उस पर तो बजट बनाते वक्त कोई ध्यान ही नहीं दिया गया है, केवल श्री नमो-नमो कहा गया है, जो बजट के प्रशंसक हैं वो कृपया देखें कि पिछले पांच-छः, सात बजटों में जितनी धनराशि निर्धारित की गई उसका कितना प्रतिशत वास्तव में अवमुक्त हुआ है और कितना प्रतिशत वास्तव में खर्च हुआ है, तो खर्च को सुधारने के लिए कोई संकल्प इस बजट में व्यक्त नहीं किया गया है तो ये मान लिया जाए कि बजट प्रावधानों का 30 प्रतिशत जो पहले भी खर्च नहीं होता रहा है, वह इस बार भी खर्च नहीं हो पाएगा। आप अब अंदाज लगा लीजिए यदि इसको मैं फुलाया हुआ लिफाफा न कहूं तो क्या कहूं? क्षमा प्रेमचंद जी, आपने शेरों-शायरी व कविता से बजट को बड़ा आकर्षक बनाने की कोशिश की है, मैं आपकी कलात्मकता की प्रशंसा के अलावा इस बजट में आपके लिए आपकी प्रशंसा हेतु शब्द ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा हूं, जब कोशिश सफल हो जायेगी तो मैं निश्चित तौर पर वह प्रशंशा के शब्द अपनी फेसबुक में उकेरूंगा।

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मैं इतना ही कह सकता हूं कि इस बजट के बाद जो राज्य के ऊपर कर्ज है वो कर्ज एक लाख करोड़ की सीमा को पार कर जाएगा।