18 February 2026

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हरीश रावत का खुलासा, उन्हें कांग्रेसियों ने ही हराया। 2024 के लिए भी इरादा बताया

हरीश रावत का खुलासा, उन्हें कांग्रेसियों ने ही हराया। 2024 के लिए भी इरादा बताया

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और सीनियर कांग्रेस नेता हरीश रावत ने लोकसभा चुनाव के लेकर अपनी दावेदारी बरकरार रखी है। हरीश रावत ने संकेत दिया है कि चुनौतियां भले ही हों लेकिन वो चुनाव मैदान से पीछे हटने वाले नहीं हैं। हरीश रावत ने अपनी सेहत का भी हवाला दिया है इसके बाद भी उन्होंने चुनाव लड़ने की अपनी इच्छा जाहिर कर दी है। हरदा ने उत्तराखंडियत के नाम पर आगे भी मोर्चा संभाले रखने का एलान किया है।

ताजा की पुरानी यादें

कांग्रेसियों ने ही चुनाव हरवाए- हरीश रावत

तिवारी जी, पंत जी, बहुगुणा जी के आभा मंडल से बाहर राजनीति में आगे बढ़ने की कठिनाइयों के बावजूद भी कोई दैवीय शक्ति थी जो मेरा हाथ पकड़कर आगे लेकर चल रही थी। जितना सुखद आश्चर्य मेरा ब्लॉक प्रमुख बनना आप लोगों के लिए था, इतना ही सुखद आश्चर्य भारत की लोकसभा में चुनाव जीतना भी था, संजय गांधी जी का आकस्मिक निधन मेरे जीवन पथ पर एक मर्मांतक चोट थी, लेकिन नियति ने उतने ही स्नेह से राजीव गांधी जी का संरक्षण मुझको प्रदान किया, जिस व्यक्ति के लिए मोहनरी और ककलासों देखना कठिन होना चाहिए था, वो व्यक्ति युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव, श्रम संगठनों के वरिष्ठ उपाध्यक्ष, कार्यकारी अध्यक्ष, अध्यक्ष, सेवादल के कर्ताधर्ता आदि पदों के साथ सारे हिन्दुस्तान और लगभग एक तिहाई से ज्यादा दुनिया को देखने और समझने का अवसर मिल गया, यह अनुभवशीलता की एक बड़ी भारी पूंजी के साथ मेरे काम आती है। लेकिन जिस समय सब कुछ ठीक चल रहा था, ऐसा लग रहा था कि मैं और ऊंचाइयों की तरफ बढ़ रहा हूं, तो मुझे गढ़ने वाले अल्मोड़ा ने ही मेरी उड़ती पतंग की डोर काट दी, चुनाव हार गया और एक ऐसे व्यक्ति से चुनाव हार गया, हारा बहुत कम वोटों से, 20-22 हजार वोट उस प्रचंड राम लहर के समय कुछ मायने नहीं रखते थे और आश्चर्य होगा कि मुझको हराने वाले व्यक्ति का नाम आज अल्मोड़ा वालों को भी याद नहीं है। मगर मुझे चुनाव में हराने का फॉर्मूला भाजपा को अवश्य मिल गया, भाजपा के इस काम को आगे बढ़ाने में कांग्रेस की कई अदृश्य शक्तियों का संरक्षण और समर्थन मिलता गया और मैं एक बाद एक कई चुनाव हार गया। मेरे एक निकटतम रिश्तेदार श्री बच्ची सिंह रावत जी, जो यूं तो खांठी के आरएसएस व्यक्ति थे उनको मेरे विकल्प के रूप में इन शक्तियों ने खड़ा किया, वह हर चुनाव में हरीश रावत हराओ-बच्ची सिंह जीताओ के कोरस के उम्मीदवार हो गये और उस समय इस कोरस को गाने वालों में बड़ी संख्या में कांग्रेस के लोग हुआ करते थे और उनको किनका संरक्षण प्राप्त था यह आज भी अल्मोड़ा में कोई भी बता सकता है। मगर जब एक रास्ता बंद हो रहा होता है तो दूसरा रास्ता खोलने के लिए भी बहुत सारी शक्तियां काम करने लगती हैं, मुझे ऐसा आभास होता है। एक तरफ डॉ. मुरली मनोहर जोशी जी, श्री नारायण दत्त तिवारी जी, श्री के.सी. पंत जी आदि की एक जुटता की हरीश रावत का विकल्प तो होना ही चाहिए और दूसरी तरफ उत्तराखंड के आठ पर्वतीय जिलों की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन के आने से कांग्रेस कमजोर हुई और उत्तर प्रदेश के साथ में जो शक्तियां सत्ता में आई उनके साथ पर्वतीय जिलों के संबंध कटूतर होते गये और परस्पर अविश्वास बढ़ता गया और जो कि कालांतर में रामपुर तिराहा कांड, मसूरी गोली कांड, खटीमा गोली कांड, देहरादून गोली कांड आदि कई रूपों में कई घटनाओं के साथ आगे बढ़ा, मैं इस दौर में भी पार्टी के साथ खड़ा रहा। लेकिन पार्टी के साथ-साथ मैंने उत्तराखंड के हितों को भी तत्कालिक घटना क्रम के साथ जोड़ने का प्रयास किया, उस समय देश के राष्ट्रीय आकाश में जितने महत्वपूर्ण नेता थे उत्तराखंड में भी समझ रखने वाले उनमें कोई भी नेता ऐसे नहीं थे जिन्होंने उस घटनाक्रम के साथ अपने को स्पष्ट जुड़ाव बनाने का प्रयास किया हो। क्योंकि दूसरी पंक्ति के नेता श्री भगत सिंह कोश्यारी जी, श्री बच्ची सिंह जी, श्री भुवन चंद्र खंडूरी जी, डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक जी, श्री सतपाल, श्री हरिपाल आदि भले ही आंदोलन के साथ किसी न किसी रूप से जुड़े रहे हों, मगर शीर्ष में बैठे हुये डॉ. मुरली मनोहर जोशी जी, श्री के.सी. पंत जी, श्री नारायण दत्त तिवारी जी आदि पूरे घटनाक्रम से अलग रहे। मैंने आलोचना भी सही, गालियां भी खाई, मगर अपना जुड़ाव आंदोलन के साथ उत्तराखंड के अंदर घटित हो रहे एक घटनाक्रम के साथ बनाए रखा, मुझको यह तो कहा जा सकता है कि हरीश रावत ने अपने पार्टी के स्वार्थ को राज्य आंदोलन के साथ जोड़ा, लेकिन कोई यह नहीं कह सकता है कि राज्य आंदोलन से कोई दूरी रखी। मैं स्वयं उस समय शीर्ष पंक्ति का नेता तो नहीं था, मगर कांग्रेस और केंद्र सरकार में मैं बहुत प्रभावशाली स्तिथि में था, कांग्रेस के तत्कालीन समय की पहली और दूसरी पंक्ति के सभी नेताओं से मेरी निकटता थी, राष्ट्रीय परिदृश्य पर भी विपक्ष के स्थापित नेतृत्व से भी मेरी अच्छी खासी निकटता थी और सेवादल के कर्ताधर्ता के रूप में मेरे पास अवसर और मानव शक्ति दोनों उपलब्ध थी जिसका मैंने भरपूर प्रयोग उत्तराखंड के तत्कालिक आंदोलन के राष्ट्रीय स्तर पर ऊपर उठाने में किया। राज्य आंदोलनकारियों की मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक बातचीत करवा कर मैंने अपनी उपयोगिता को बढ़ाया और यह भी एक संयोग है कि 1996 के बाद देश के राजनीतिक घटनाक्रम का राज्य आंदोलन की शक्तियों के मनोबल पर विपरीत असर पड़ा और निराशा में उन्हीं लोगों ने जो मुझसे गहरी नाराजगी रखते थे, उन्होंने मुझे संयुक्त संघर्ष समिति का जब दूसरा जन्म हुआ तो उस जन्म का संयोजक मुझको बनाया, अध्यक्ष श्री दिवाकर भट्ट जी बने और यह भी निर्धारित नहीं किया की दिवाकर भट्ट जी कुछ समय बाद संयुक्त संघर्ष समिति से घोषित और अघोषित रूप से अलग हो गये। लेकिन जो कुछ संघर्ष समित के रूप में हमने जो कार्यक्रम किये उन्होंने एक बार राज्य आंदोलन की मध्य बढ़ती हुई लौ को तेज कर दिया और फिर जो कुछ हुआ कोलकाता के कांग्रेस महाधिवेशन में छोटे राज्यों के पक्ष में प्रस्ताव बनने के बाद एक राष्ट्रीय सर्वानुमति पूरे देश में बन पाई और उसके परिणाम स्वरूप 9 नवंबर, 2000 को “उत्तराखंड” राज्य अस्तित्व में आया। मैं आज जब इन घटनाओं पर कुछ लिख रहा हूं तो मेरा मन मुझसे स्वयं सवाल कर रहा है कि यदि तुम 1991 का अल्मोड़ा से चुनाव जीत जाते लोकसभा का तो राव मंत्रिमंडल में तुम्हारा स्थान निश्चित था, हो सकता है तुम्हारे जीवन की धारा कुछ दूसरी तरफ बदल जाती।

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2002, 2012 में सीएम ना बन पाने का मलाल

यह अच्छा हुआ या बुरा हुआ, यह मैं नहीं जानता। सन् 1999 में मैं बहुत कम वोटों से हारा 10-12 हजार के करीब से हार गया, अटल जी को प्रधानमंत्री बनाने के लड़ाई के आलोक में यह चुनाव अल्मोड़ा ने चाहते हुए भी मुझे लोकसभा सदस्य नहीं बनाया। मैंने सोचा कि अब संसदीय जीवन का रास्ता बंद हो जायेगा लेकिन फिर राज्य बन गया। राज्य बनने के बाद पहले निर्वाचन में कांग्रेस जीत कर आ गई, मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गया, लेकिन राज्यसभा का मेंबर बना दिया। राज्यसभा के सदस्य के रूप में मुझे मंत्री बनाया जाना था। मैंने समय पर न पहुंचने की अपनी असमर्थता जताई और मंत्री बनते-बनते रह गया और उसका परिणाम रहा कि अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र आरक्षित होने के बाद मुझे पार्टी ने हरिद्वार से लड़ा दिया। लोग कहते हैं कि हरिद्वार से कांग्रेस कभी नहीं जीती थी, इसलिये मुझे निपटाने के लिए हरिद्वार भेजा गया था। लेकिन हरिद्वार की जनता को कुछ और मंजूर था। उन्होंने एक विशाल बहुमत से मुझे चुनाव जितवा दिया और केंद्र सरकार में बिन मांगे मोती मिलते गये, 2012 में मैं प्रतीक्षा कर रहा था कि पार्टी मुझसे कहेगी कि हरीश तुमको 2002 में अवसर नहीं दे पाए, आओ इस समय मौका है पार्टी के पास हम तुमको मुख्यमंत्री बनाते हैं। मगर एक कूट रचना हुई, जिनके पास कोई अनुभव नहीं था संसदीय जीवन का उन्हें मुख्यमंत्री पद से नवाजा गया। मैंने सोचा कि अब दिल्ली की राजनीति में ही रहना है, मगर 2013 में जो त्रासदी उत्तराखंड में आई वह मुझे फिर से उत्तराखंड लेकर के आ गई। आज मैं यह सोचता हूं कि हवाई दुर्घटना के बाद मृत्यु तो निश्चित लग रही थी लेकिन अपंग होकर खिसक-खिसक के मरु, मरने के बजाए मैं आकस्मिक मृत्यु की प्रार्थना कर रहा था तो मैं स्वस्थ होकर के आज आप लोगों के सामने खड़ा हूं, फिर ये भी एक विचित्र संयोग है कि कोरोना के भंयकर संक्रमण के बाद 19 दिन आईसीयू में रहकर मैं दिल्ली से वापस लौट आया और आज जब मुझे सब कुछ स्वस्थ और संघर्षशील दिख रहा था और यह चाहता था कि एक बार पार्टी के विजय पथ के लिए मैं झंडा थाम कर आगे-आगे चलूं तो उस समय एक प्राण घातक सड़क दुर्घटना ने मुझको अंदर तक हिला के रख दिया। शरीर का कोई हिस्सा ऐसा नहीं है जिसमें दुर्घटना का असर न पड़ा हो और यह संयोग ही है जो इसके बावजूद भी मुझे जिंदा खड़े रखा है। देखते हैं यह संयोग कितने दिनों तक मेरे राजनीतिक जीवन पथ की संजीवनी बने रहते हैं! एक आकांक्षा का दीया मुझे हमेशा प्रेरित करता रहेगा, वह आकांक्षा है “उत्तराखंडियत”….!! बहुत पाया-बहुत खोया, मगर उत्तराखंडियत की सोचों को मजधार में छोड़ना बहुत कमजोर पड़ चुके हरीश रावत के लिए संभव नहीं है।

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2024 की लड़ाई के लिए तैयार

मैं आज इस पल का विश्लेषण इस बात पर अंतरमन से कर रहा हूं कि तिवारी जी के आभामंडल से अलग हटकर चलना भले ही मेरे लिए कष्टदायक रहा हो लेकिन उत्तराखंड और कांग्रेस के लिए कष्टसाध्य नहीं रहा। मैंने पार्टी और पार्टी के अंदर नये लोगों को लाने के लिए बड़ी सार्थक भूमिका बनाई, आप आज की कांग्रेस को देखिये कई लोग हैं जो नामचीन व्यक्ति हैं, जो कांग्रेस की धारा में नहीं थे मगर संयुक्त संघर्ष समिति में मेरे साथ काम करते-करते व कांग्रेस में आए और आज कांग्रेस के लिए सहायक है। श्री प्रताप सिंह बिष्ट जी जिन्हें उक्रांद से लाकर मैंने अपने गृह ब्लॉक से विधानसभा का चुनाव लड़वाया और विधानसभा के सदस्य बने, उससे राज्य आंदोलन की बहुत सारी ताकतें हमारे साथ नीचे के स्तर पर जुड़ी इससे कांग्रेस पार्टी के अंदर एक नये रक्त का संचार हुआ, नये लोग आये। उससे पहले भी आप अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत में देखिये तो कांग्रेस आपको दूसरे क्षेत्रों से कुछ ज्यादा जवान दिखाई देगी और एक अच्छा समन्वय दिखाई देता है। उम्र और युवा उत्साह का मैंने नियोजन पूर्वक बहुत सारे युवाओं की राह कांग्रेस के अंदर तैयार की और मुझे बेहद खुशी है कि आज अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र की कांग्रेस में वो लोग महत्वपूर्ण नाम हैं, आगे के नेतृत्व की संभावनाएं हैं और मुझे आज अपने उस समय के साथी भी याद आ रहे हैं जिनको अपने युवा कांग्रेस के कार्यकाल में जिला स्तर पर पधाधिकारी बनाया था उनमें से श्री पूरन सिंह माहरा जी, श्री गोविंद सिंह कुंजवाल जी, श्री प्रकाश जोशी जी, श्री हरीश अग्रवाल जी, श्री इंद्र सिंह परिहार जी, श्री राम गिरी गोस्वामी जी, श्री बालम सिंह जनौटी जी, श्री लक्ष्मण सिंह माहरा जी, श्री भूपेंद्र सिंह रावत जी, श्री घनश्याम दत्त ममगाई जी, श्री सोहन सिंह रावत, कई ऐसे नाम हैं जिन्होंने अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र की कांग्रेस को लंबे समय तक सेवा दी, ब्लॉक प्रमुख के रूप में, एमएलए के रूप में और आज भी जिला पंचायत के सदस्य और जिला कॉपरेटिव बैंक के अध्यक्ष के रूप में ये सब लोग युवा कांग्रेस की जिला कार्यकारिणी में मेरे साथ पदाधिकारी थे, मैंने निरंतर अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस को झरे से कुछ अलग हटकर गति देने का प्रयास किया और यही प्रयास मैंने हरिद्वार में भी किया। इसलिये अल्मोड़ा के बाद यदि कांग्रेस संगठनात्मक रूप से एक चुनौती देती स्तिथि में कहीं दिखाई दे रही है तो, वह हरिद्वार है। श्री जे.पी. पांडे आज इस चुनौती के वक्त में बहुत याद आ रहे हैं, एक संघर्षशील व्यक्ति थे। जब मैं नैनीताल संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा तो मैंने वहां भी प्रयास किया कि मैं नये लोगों को जोडूं और एक समन्वय बनाऊं। राजनीति के अंदर आप एक ही धारा एक ही सोच से काम नहीं कर सकते आपको अलग-अलग धाराओं के बीच में भी समन्वय बनाना पड़ता है, उनको जोड़ना पड़ता है ताकि पार्टी किसी भी चुनौतीपूर्ण स्तिथि का मुकाबला करने के लिए अपने को खड़ा कर सके। आज मैं देहरादून को लेकर के चिंतित हूं जबकि देहरादून की जड़-जड़ में कांग्रेस है। यदि सबसे मजबूत कांग्रेस कहीं है व्यक्तियों को देखकर, यदि हम व्यक्तियों को अलग-अलग देखते हैं तो कांग्रेस राजनीतिक दल के रूप में देहरादून में भाजपा से भी आगे खड़ी है। मगर समन्वय और पारस्परिक जोड़ के अभाव में सब बिखरा-बिखरा सा लगता हैं। टिहरी तो स्वाभाविक रूप से कांग्रेस का मायका है। हमारे मायके पर यहां की सामाजिक संरचना दिखती है। संसदीय क्षेत्र टिहरी पर तो कांग्रेस हारनी ही नहीं चाहिए, किसी भी स्तिथि में नहीं हारनी चाहिए लेकिन इसी तरीके की समन्वय स्थापित नहीं होने के कारण लड़ाई थोड़ा सा कठिन दिखाई देती है। पौड़ी की राजनीतिक सोच कुछ भिन्न तरीके की है, वहां चातुर्यपूर्ण चयन कांग्रेस को हमेशा कनटेंशन में रख सकता है। देखते हैं आगे संयोग क्या चाहता है ? पार्टी का नेतृत्व क्या चाहता है ? प्रादेशिक नेतृत्व क्या चाहता है? लेकिन जब इस दुर्घटना से उभरने के संघर्ष के लिए मैं खड़ा हूं तो ऐसे समय में मेरा मन मुझसे बार-बार यह कह रहा है कि अपने लिये न सही, अपने परिवार के लिए न सही, लेकिन अपनी पार्टी के लिए कुछ आगे की सोचों, कुछ समन्वय, सामंजस्य और संघर्ष शीलता पैदा करो, इन तीनों का सहारा लेकर अपने साथियों से बातचीत करो ताकि 2024 की पार्टी की राह शुभ हो। समय बहुत कम है, रास्ता बहुत लंबा और कठिन है, फिर भी एक सेवा के रूप में मैं कांग्रेस के लिए अपनी बची-खुची शक्ति को समर्पित कर सकूं। संयोग रूपी भगवान मेरी मदद करें। हरीश रावत की इन बातों से साफ है कि वो सियासी मैदान से अभी पीछे हटने वाले नहीं हैं। उनकी निगाहें हरिद्वार लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने पर टिकी हैं।

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