कामरेड इंद्रेश मैखुरी ने धामी सरकार की नीयत पर फिर सवाल उठाए हैं। मैखुरी ने कहा कि अंकिता भंडारी प्रकरण में सीबीआई जांच की घोषणा के बाद भी उत्तराखंड सरकार द्वारा छल किया जाना निंदनीय है। अंकिता भंडारी के परिजनों से एफआईआर न करवा कर पर्यावरणविद कहे जाने वाले अनिल प्रकाश जोशी से एफआईआर करवाया जाना उत्तराखंड सरकार की मंशा पर संदेह पैदा करता है।
अनिल प्रकाश जोशी, की इस मामले में कभी कोई भूमिका नहीं रही और आम तौर पर वे सरकार परस्त पक्षधरता के लिए ही जाने जाते हैं। इसलिए संदेह होता है कि उत्तराखंड सरकार इस मामले में पुनः कोई छल कर रही है। इंद्रेश मैखुरी ने कहा कि बीते कुछ दिनों से इस मामले में वीआईपी के तौर भाजपा के ही दो बड़े नेताओं- दुष्यंत कुमार गौतम और अजय कुमार का नाम लिए जाने के बाद कुछ संदिग्ध चरित्र लोगों का प्रवेश अचानक से करवाया गया, पहले सांप्रदायिक तनाव फैलाने के लिए कुख्यात व्यक्ति और अब सरकार के पक्षधर पर्यावरणविद ! ये दर्शाता है कि इस मामले में नियत न तो वीआईपी को कानून के कठघरे में खड़ा करने की है और ना ही अंकिता भंडारी को न्याय दिलानी की है. मंशा सिर्फ भाजपा के ताकतवर चेहरों को बचाने की है और इसलिए मामले को उलझाने के लिए नित नये संदिग्ध किस्म के पात्रों का प्रवेश करवाया जा रहा है। उत्तराखंड सरकार और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से साफ तौर पर कहना है कि इस मामले में इस तरह का छल बंद किया जाना चाहिए और अगर सीबीआई जांच के लिए किसी एफआईआर की आवश्यकता है तो वह अंकिता भंडारी के परिजनों की ओर से दर्ज करवाई जानी चाहिए. सीबीआई जांच उच्चतम न्यायालय के सेवारत न्यायाधीश की निगरानी में होनी चाहिए।

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