26 February 2026

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स्वतंत्र विचारक हरीश खकरियाल ने अंकिता केस को लेकर बीजेपी के रुख पर उठाए सवाल, आरोपियों को दी इस्तीफा देने की नसीहत

स्वतंत्र विचारक हरीश खकरियाल ने अंकिता केस को लेकर बीजेपी के रुख पर उठाए सवाल, आरोपियों को दी इस्तीफा देने की नसीहत

उत्तराखंड में अंकिता भंडारी केस को लेकर लगातार आक्रोश बढ़ रहा है। लोग सड़कों पर उतरे हैं और सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं। वहीं स्वतंत्र विचारक हरीश खकरियाल ने भी इस मुद्दे को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं ‌। हरीश खकरियाल ने कहा कि अंकिता हत्याकांड प्रकरण में VIP नाम वालों को स्वयं पद त्याग करना चाहिए। उत्तराखंड की बेटी अंकिता की हत्या आज केवल एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह पूरे पहाड़ के दर्द, उसकी सामाजिक विवशताओं और बेटियों की सुरक्षा पर खड़े बड़े प्रश्न का प्रतीक बन चुकी है। यह प्रकरण हमें यह सोचने पर विवश करता है कि आखिर पहाड़ की बेटियाँ कब तक असुरक्षित रहेंगी और कब तक गरीबी और विवशता उन्हें उनकी अस्मिता से लेकर मौत तक का सफर तय करने को मजबूर करेंगी।
पहाड़ का जीवन हमेशा से ही संघर्षपूर्ण रहा है। सीमित साधन, रोजगार की कमी और बढ़ती महंगाई के बीच यहां के अनेक माता-पिता विवश होकर अपनी बेटियों को घर से दूर, होटल और रिसॉर्ट जैसे स्थानों पर नौकरी करने भेजते हैं। यह कोई शौक या आधुनिकता की चाह नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक जरूरतों से उपजी विवशता होती है। ऐसे माता-पिता हर दिन इस भय के साथ जीते हैं कि उनकी बेटी सुरक्षित है या नहीं। हरीश खकरियाल ने कहा अंकिता भी इसी पहाड़ की बेटी थी, जिसे उसके माता-पिता ने विश्वास के साथ नौकरी पर भेजा था। वह विश्वास बेटी ने तो नहीं तोड़ा, लेकिन सिस्टम के आगे उसकी मौत के दिन से लेकर आज तक हर पल टूटता रहा है। एक परिवार का यह दर्द पूरे समाज का दर्द बन चुका है।

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ये घटना केवल एक बेटी की हत्या नहीं, बल्कि पहाड़ की उन सभी बेटियों की सुरक्षा पर प्रश्न है, जो रोजगार की तलाश में घर से बाहर जाती हैं। हरीश खकरियाल ने कहा कि हालिया घटनाक्रम में जब कुछ प्रभावशाली और VIP लोगों के नाम इस प्रकरण से जुड़े दिखाई दिए, तब जनता का विश्वास और अधिक डगमगा गया है। ऐसे समय में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि दोषी कौन है, बल्कि यह होता है कि क्या न्याय निष्पक्ष रूप से हो पाएगा। यहीं से नैतिकता की भूमिका प्रारंभ होती है। लोकतंत्र में पद कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि जनता द्वारा सौंपा गया उत्तरदायित्व होता है। जब किसी गंभीर मामले में किसी सार्वजनिक व्यक्ति का नाम सामने आता है, तब उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह स्वयं आगे आकर पद से अलग हो, ताकि जांच पर किसी प्रकार का दबाव या संदेह न रहे। यही नैतिकता का मूल सिद्धांत भी है। भारतीय राजनीति में इसके उदाहरण पहले भी रहे हैं। हरीश खकरियाल ने कहा भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी जी ने वर्ष 2005 में अपने एक बयान को लेकर उठे विवाद के बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से स्वयं त्यागपत्र दिया था। उस समय उनके विरुद्ध कोई न्यायिक दोष सिद्ध नहीं हुआ था, पर उन्होंने यह मानकर कि उनके पद पर बने रहने से पार्टी और सार्वजनिक जीवन के मूल्यों पर सवाल उठ सकते हैं, नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ना उचित समझा। उनका यह निर्णय आज भी राजनीतिक नैतिकता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। इसी प्रकार भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता मदनलाल खुराना ने भी एक प्रकरण में नाम आने पर दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया था। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि जनता की पीड़ा के लिए प्रशासन को जवाबदेही लेनी चाहिए। इन उदाहरणों से ये स्पष्ट होता है कि जब किसी सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्ति पर सवाल उठते हैं, तब पद से चिपके रहना नहीं, बल्कि पद से अलग होना ही लोकतांत्रिक और सामाजिक मूल्यों के अनुरूप होता है। इसी भावना के अनुरूप, वर्तमान प्रकरण में जिन VIP लोगों के नाम सामने आए हैं, वे चाहे किसी भी पद पर हों या किसी भी संगठन से जुड़े हों, उनसे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे स्वयं यह घोषणा करें कि—
“जब तक हम इस मामले में पूर्ण रूप से निर्दोष सिद्ध नहीं हो जाते, तब तक हम पार्टी, संगठन या सरकार में किसी भी पद पर नहीं रहेंगे।” ऐसी घोषणा ही समाज और सत्ता के बीच विश्वास की वह लकीर खींच सकती है, जिसकी आज सबसे अधिक आवश्यकता है। हरीश खकरियाल ने कहा सरकार और प्रशासन की नीयत पर संदेह करना उद्देश्य नहीं है, लेकिन ये भी सत्य है कि जब प्रभावशाली लोगों के नाम सामने आते हैं, तब स्थानीय स्तर की जांच पर सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है। ऐसी स्थिति में एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच ही सच्चाई को बिना किसी दबाव के सामने ला सकती है। अब समय आ गया है कि राज्य सरकार या केंद्र सरकार स्वयं संज्ञान लेते हुए इस पूरे प्रकरण की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपे। जब पहाड़ के हर घर से, हर माता-पिता के दिल से और हर बेटी की खामोश आंखों से एक ही जांच की आवाज उठ रही हो, तब सरकार को बिना किसी देरी के और बिना जिम्मेदारी से भागे, शीघ्र यह निर्णय लेना चाहिए। अंकिता को न्याय मिलना केवल एक परिवार को न्याय देना नहीं होगा, बल्कि यह पहाड़ की हर बेटी को यह भरोसा देगा कि उसकी विवशता या उसके सपने उसकी कमजोरी नहीं बनेंगे। अंकिता को न्याय मिलना चाहिए।
क्योंकि बेटियों की सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं हो सकता।