18 February 2026

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सिलक्यारा हादसा, हरीश रावत के सवाल

सिलक्यारा हादसा, हरीश रावत के सवाल

उत्तराखंड के उत्तरकाशी में सिलक्यारा टनल हादसे के बाद रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है। उम्मीद है कि जल्द ही श्रमिकों को बाहर निकाल लिया जाएगा। इस बीच बहुत सारे ऐसे सवाल भी हैं जो उत्तराखंड के भविष्य से जुड़े हैं। अंधाधुंध विकास की दौड़ में टनलिंग का काम हो रहा है और बड़े बड़े सपने भी दिखाए जा रहे हैं, सवाल ये है कि क्या इस विकास का कुदरत के साथ संतुलन है?

हरीश रावत ने उठाए कई सवाल

पूर्व सीएम हरीश रावत ने भी तमाम सवाल उठाने के साथ ही जवाब मांगा है।हरीश रावत ने लिखा है सिलक्यारा एक छोटा सा पहाड़ी गांव जो राड़ी की पहाड़ी में ब्रहमखाल से लगभग 7 किलोमीटर आगे जहां चाय की कुछ छोटी दुकानें और घरेलू साज सामान की कुछ दुकानें और कभी आते-जाते रुकती वहां गाड़ियां आदि और विशेष तौर पर यात्रा मार्ग होने के कारण यात्रा के दौरान चहल-पहल रहती है। जब यमनोत्री राजमार्ग को डबल लेन बनाने का और सिलक्यारा से बड़कोट के पास जहां से यमनोत्री को मार्ग जाता है उससे 2 किलोमीटर पहले सुरंग निकालने का फैसला हुआ तो फैसले के पक्ष और विपक्ष पर बहुत सारी बातें उठी हैं। लेकिन कुल मिलाकर यह मानना था कि एक अनावश्यक दूरी जो राड़ी की पहाड़ी के कारण यात्रा मार्ग में खपनी पड़ती हैं उससे बचा जाना चाहिये और लोगों का यह भी मानना था कि टलन बनने से आजीविका का घाटा भी कम होगा, क्योंकि कुल मिलाकर यह 25-26 किलोमीटर का जो भी दायरा आएगा उस दायरे में ज्यादा जगह ऐसी नहीं हैं जहां आजीविका से जुड़े हुये सवाल खड़े होंगे छोटी दुकानें हैं, सिलक्यारा के पास में भी एक-दो महत्वपूर्ण मार्ग आकर के मिलते हैं। मगर उस समय भी प्रसिद्ध भू-गर्भ शास्त्री रहे डॉ. खड़क सिंह बल्दिया जी उनकी एक रिपोर्ट में जिक्र है कि सिलक्यारा के आस-पास की जमीन जो कुछ ढीली भूमि है, उनका यह भी कथन था कि इसके पास से कम से कम दो फॉल्ट लाइनें गुजरती हैं। ऑस्ट्रेलिया की जिस विशेषज्ञ टीम को यह काम सौंपा गया था उनके संज्ञान में यह तथ्य था या नहीं, मुझे यह जानकारी नहीं है। लेकिन ये बातें अब छनकर के बाहर आ रही हैं कि ऑस्ट्रेलियन एक्सपर्ट की राय की वेटिंग नहीं करवाई गई उसमें कुछ और ओपिनियन सम्मिलित करवाने का प्रयास नहीं किया गया। बहरहाल काम चल रहा था, अचानक 12 नवंबर को सुबह 5 बजे टनल के अंदर एक बड़ा भू-स्खलन हो जाता है और टनल बंद हो जाती है, पहले 40 बाद में पता चलता है कि 41 लोग टनल के अंदर फंस गये हैं, एक-दो दिन बाद यह बातें सामने आती हैं और फिर यह बातें भी सामने आती हैं कि टनल के अंदर जो सेफ्टी लाइन थी, ह्यूम पाईप (Hume Pipe) की वह कुछ दिन पहले हटा दी गई थी और यह भी कहा जा रहा है कि पैकेजिंग जिसमें गाडर का उपयोग होना चाहिए था, वह पैकेजिंग जहां-जहां टनल बनाई गई थी वहां प्रॉपर्ली नहीं करवाई गई थी और जो मैटेरियल लगाया गया था, वह उस कैपेसिटी का नहीं था, जिस कैपेसिटी का लगाया जाना चाहिए था। लोग यह बताते हैं कि वहां पर पहले भी उसके आस-पास स्थानों में कई बार भू-धंसाव हुआ है जिसकी कोई रिपोर्ट बाहर नहीं आई, अब यह तथ्य भी सामने आये हैं कि जिला प्रशासन और राज्य आपदा प्रबंधन का कोई पारस्परिक संबंध यहां जो कंपनी काम कर रही थी उस कंपनी के साथ नहीं था, NHI ने जिसको काम सौंपा था उस कंपनी का भी स्थानीय स्तर पर कोई संपर्क प्रकाश में नहीं आया है। आज इस समस्त प्रकरण को लेकर बहुत सारे सवाल उठ रहे हैं और आगे भी उठेंगे। आज श्रमिकों को जीवन और मौत से जूझते हुये 16 दिन हो रहे हैं। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय, प्रत्येक प्रकार की सलाह सिलक्यारा में बचाव में जुटे तंत्र को मिल रही है। नए-नए प्रयोग और उपकरण अजमाये जा रहे हैं, कभी समाचार पत्रों से पता चलता है कि बचाव के लिए 6 उपायों पर एक साथ काम हो रहा है। माननीय मुख्यमंत्री जी ने अपनी सारी चुनावी व्यवस्थाओं के बावजूद सिलक्यारा को अपेक्षित महत्व दिया है‌। माननीय नितिन गडकरी जी के घटनास्थल पर पहुंचने के बाद हमें उम्मीद थी कि इस सारे मामले को राष्ट्रीय चुनौती के रूप में शीघ्र निपटा दिया जायेगा। राज्य के सार्वजनिक जीवन के प्रत्येक पक्ष ने इस मामले को लेकर राज्य में सकारात्मक सहयोग का वातावरण भी बनाकर के रखा है। मीडिया भी पहले मैं वाले लालच के बजाय इस चुनौती का राज्य का सामुहिक सवाल मान रहा है और तदनुरूप आत्म संयम बनाये हुये है। अभी ऐसा लगता है कि श्रमिकों का बचाव कार्य कम से कम एक सप्ताह और लेगा। हम भगवान से प्रार्थना ही कर सकते हैं कि श्रमिक अत्यधिक दुर्घष पूर्ण विषम परिस्थितियों में अपना मनोबल बनाए रखेंगे और हम सब उनका राजकीय हीरो के रूप में स्वागत करेंगे। इस तरीके की परिस्थितियों में बचाव को लेकर जो हमारा ट्रैक रिकॉर्ड है, वह और गंदा होने से बच जायेगा। यह कोई नहीं देखेगा कि किस स्तर पर लापरवाही हुई है, किस स्तर तक राज्य सरकार की संलग्नता थी इस सब प्रकरण में ! सिलक्यारा से आगे क्या होगा ? बचाव कार्य पूर्ण होते ही क्या मामले को यहीं पर छोड़ दिया जाना चाहिए? एक दर्जन से ज्यादा ऐसे भूगर्भीय दुर्घटनाएं हैं जिन घटनाओं में भारी संख्या में जनहानि हुई, मगर हमने हर बार बहुत सारे सबक सीखने की बात कही, सेफ्टी ऑडिट शब्द तो एक आम प्रचलित शब्द हो गया है। हम ढेरों विषयों में सेफ्टी ऑडिट की बात करते रहे हैं और मामले को भूलते रहे हैं। शायद ही ऐसी कोई परियोजना होगी, यहां तक कि अब तो पुलों के सेफ्टी ऑडिट की बात कही जाती है, लेकिन बहुत सेफ्टी अथॉरिटी ऑफ उत्तराखंड, कहीं नजर नहीं आती है। मगर एक सार्वभौम वास्तविकता है कि हर नहीं घटना, दूसरी घटनाओं के उठे सवालों को अनुत्तरित छोड़ देती है, क्या सिलक्यारा से उठे सवाल भी अनुत्तरित रह जाएंगे, यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न है? यदि हम एक के बाद एक ऐसी अनचाही भूलें करेंगे तो इसका खामियाजा हमको एक भीषण दुर्घटना के रूप में भी देखने को मिल सकता है। नेपाल के भूकंप की त्रासदियों को घटित हुये ज्यादा समय नहीं हुआ है। उत्तराखंड के अधिकांश भू-भाग, भू-कंपनी क्षेत्र 4 और 5 के अंतर्गत आते हैं‌। देहरादून में जिस संवेदनशील क्षेत्र में सर्वाधिक बहुमंजिली इमारतें बन रही हैं वह ऐसा ही संवेदनशील क्षेत्र है।

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पूरी तरह टनल विरोधी नहीं- हरीश रावत

हरीश रावत ने आगे लिखा है मैं, टनल टेक्नोलॉजी के सुविचारित सीमित उपयोग का समर्थक हूं। चाहे बहुत छोटे पैमाने पर ही सही राज्य बनने के बाद पहली ऐसी टनल डांठ काली के निर्माण की स्वीकृति भी मेरे ही कार्यकाल में दी गई। मगर आज टनलिंग को एक फैशन के रूप में विकसित होते देखकर मैं चिंतित हूं। उत्तराखंड की सबसे बड़ी संपदा भू परिस्थितियां हैं, हमें प्रत्येक मूल्य पर पर्यावरण की रक्षा करनी है। बड़ी-बड़ी टनलें पर्यावरणीय (भूगर्भीय) दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील हैं। इस तथ्य से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन के निर्माण में टनल टेक्नोलॉजी का अंधाधुंध उपयोग आज हम सबके लिए चिंता का कारक बना हुआ है, परियोजना प्रभावित गांवों में पड़ी दरारें और सूखते पेयजल श्रोत निरन्तर चर्चा में आ रहे हैं। हमारे राज्य में किस सीमा तक एक स्थान से दूसरे स्थान के बीच की दूरी घटनी है यह एक व्यवहारिक चिंतन का विषय है। देहरादून से सरपट सुरंग के रास्ते टिहरी पहुंचने की कामना प्रत्येक व्यक्ति को उल्लासित करेगी, मगर इस टनल के निर्माण के साथ मार्ग के कई पर्यटक स्थलों, व्यावसायिक केंद्रों के अर्थव्यवस्था पर पढ़ने वाले दुष्परिणाम का जब आप गहराई से अध्ययन आधारित विश्लेषण करते हैं तो आप अपने को गहरे नुकसान में पाते हैं। आज चारधाम विशेष तौर पर गंगोत्री में टनल निर्माण की बात कही जा रही है। क्या गंगा-यमुना जैसी हिमाद्री उद्गमित नदियों पर पड़ने वाले संभावित असर का अध्ययन कर लिया गया है? मसूरी के केंपटी क्षेत्र में टनल निर्माण के दुष्परिणाम का जो अध्ययन सामने आया है वह हमारे चिंतावर्धन के लिए पर्याप्त है। राज्य, कॉर्बेट क्षेत्र में एलिवेटेड मोटर निर्माण मार्ग की वर्षों से मांग कर रहा है आखिर इस मांग को नकारे जाने का कोई तो कारण संभव है। यदि मैदावन से आदिबद्री और मोहान से मरचूला तक टनल निर्माण की बात कही जाएगी या अल्मोड़ा में एक सीमित टनल निर्माण द्वारा शहर के दोनों भू-भागों को जोड़ने की बात आएगी तो कई सवाल उठकर के खड़े हो जाते हैं। मगर जल विद्युत परियोजनाओं या टनल निर्माण के माध्यम से प्रमुख स्थलों को जोड़ने की बात आती है तो उत्तराखंड के विकास की दुहाइयां गूंजने लगती हैं। हमें मौलिक तौर पर यह तय करना है कि राज्य का विकास किसके लिए और किसकी कीमत पर !! हम केवल पर्यटकों के आवागमन को दृष्टिगत करते हुए कोई निर्णय नहीं ले सकते हैं। हमें पर्यटन, पर्यावरण और आजीविका के मूलभूत प्रश्नों पर एक विहंगम विवेचन के माध्यम से समन्वय स्थापित करना पड़ेगा अन्यथा हम अपने आप से यह सवाल पूछते फिरेंगे कि विकास का मुख्य लाभार्थी कौन ? और हमने अभी तक विकास के लिए जो जिंदगियों का मूल्य चुकाया है उससे सबक लिया गया है या नहीं !! कावड़ यात्रा और चारधाम यात्रा का भी तर्कपूर्ण मूल्यांकन आवश्यक है। जब देहरादून से टिहरी झील तक टनल निर्माण की बात कही जाती है तो मुझे ऋषिकेश से लेकर टिहरी तक जुड़े हुये समस्त यात्रा स्थल और उनसे जुड़ी आजीविका याद आती है‌। चारधाम यात्रा मार्ग के सुधारीकरण से लेकर इस पूरे प्रोजेक्ट को ऑल वेदर रोड में बदलने की मानसिकता चिंता में डाल देती है।उत्तराखंड जैसे राज्य को आज इस तरीके की सतही सोच आधारित धारणा पर गंभीर विवेचन करने की आवश्यकता है। मैं समझता हूं कि सिलक्यारा के श्रमिकों की 16 दिन की यह तपस्या हमारे लिए एक मशाल का काम करेगी।