15 September 2026

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सनातन संस्कृति पर हरिद्वार में दो दिन तक मंथन

सनातन संस्कृति पर हरिद्वार में दो दिन तक मंथन

सनातन संस्कृति पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन पर केंद्रीय जनजातीय राज्य मंत्री दुर्गा दास उईके ने कहा कि समाज में व्याप्त तमाम अव्यवस्थाओं के लिए पश्चिमी संस्कृति का दर्शन जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी कूड़ा करकट सर माथे पर लगाने की प्रवृत्ति ने भारतीय संस्कृति के ताने बाने को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। ऐसे में सुधार के लिए सनातन संस्कृति की ओर देखने की आवश्यकता है। सनातन संस्कृति पर हरिद्वार में दो दिन तक मंथन

संगोष्ठी का आयोजन देवभूमि विकास संस्थान और देव संस्कृति विश्वविद्यालय की ओर से किया गया। समापन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि केंद्रीय राज्य मंत्री ने कहा कि सनातन संस्कृति अदभुत है, जो हमें जीवन के असल उद्देश्य से परिचित कराती है। उन्होंने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति से हमें भोगी दृष्टि मिली है। इसने हमारे व्यक्तित्व में दोहरापन ला दिया है। इससे पतन हो रहा है। उन्होंने गायत्री परिवार से अपने संबंधों का जिक्र करते हुए सनातन संस्कृति के प्रसार में उसके योगदान की विशेष चर्चा की।

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देव संस्कृति विश्व विद्यालय के प्रति कुलपति डॉ चिन्मय पंड्या ने अपने संबोधन में कहा कि भारत एक देश का नहीं, बल्कि संस्कृति का नाम है। दुनिया के तमाम देशों में सनातन संस्कृति के आज भी चिन्ह मौजूद हैं। भारत की भूमि मानव को मानव बनाने वाली भूमि है। अन्य देशों का इतिहास बर्बरता का रहा है, जबकि भारत के इतिहास करुणा, परोपकार का है।

 

कार्यक्रम में अखिल भारतीय स्वयंसेवक संघ के पर्यावरण कार्यक्रम के संयोजक गोपाल आर्य और हरिद्वार सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी विशेष रूप से अपने विचार साझा किए।

 

गोपाल आर्य ने इस दिन को सिर्फ धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि विचार की नई धारा की शुरुआत के रूप में देखा। उन्होंने कहा, “यह दिन नववर्ष और नवरात्र का पहला दिन है। चिंतन की धारा का भी यह पहला दिन है। जब समाज में इस तरह के विषयों पर मंथन होता है, तो सवाल उठते हैं और वहीं से दिशा मिलती है।”

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उन्होंने वर्तमान आर्थिक विकास का ज़िक्र करते हुए कहा, “आज हम आर्थिक रूप से विश्व में तीसरे नंबर पर हैं, लेकिन पर्यावरण के प्रति दृष्टिकोण बदलने की जरूरत है। प्रकृति जो हमें सुरक्षा देती है, क्या हम उसका संरक्षण कर पा रहे हैं?” उन्होंने कहा कि जल को केवल ‘वाटर’ नहीं बल्कि ‘जीवन’ के रूप में महसूस करना होगा। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे आत्मविश्लेषण करें कि क्या उनकी जीवनशैली पर्यावरण के अनुकूल है या नहीं।

 

गोपाल आर्य ने आगे कहा, “हमें प्रकृति को परमात्मा मानना होगा, पृथ्वी को एक जागृत इकाई की तरह देखना होगा। जब तक हम अपने आचरण में बदलाव नहीं लाते, पर्यावरण संरक्षण सिर्फ एक चर्चा का विषय बना रहेगा।”

 

कार्यक्रम में हरिद्वार से सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा, “आज पूरा विश्व आशा भरी नजरों से सनातन की ओर देख रहा है। पर हर भारतीय सनातनी को आत्मविश्वास जगाना होगा कि हम वास्तव में विश्व को मार्ग दिखा सकते हैं।”

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उन्होंने देवभूमि विकास संस्थान की पर्यावरणीय पहल की सराहना की। संस्थान जल संरक्षण, वृक्षारोपण, रक्तदान, अंगदान और देहदान जैसे अभियानों के माध्यम से समाज को जागरूक कर रहा है।

कार्यक्रम के अंत में सभी वक्ताओं ने एक स्वर में यह संदेश दिया कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से नहीं होगा, जब तक आम नागरिक अपनी जीवनशैली और सोच में बदलाव नहीं लाते। प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व ही टिकाऊ विकास की कुंजी है।