27 September 2026

Pahad Ka Pathar

Hindi News, हिंदी समाचार, Breaking News, Latest Khabar, Samachar

पशुपालकों के साथ हो रहा मजाक, लीटर और किलो के जाल में किसने उलझाया?

पशुपालकों के साथ हो रहा मजाक, लीटर और किलो के जाल में किसने उलझाया?

पहाड़ का पशुपालक दूध की एक-एक बूंद के लिए मेहनत करता है, लेकिन दूध खरीद व्यवस्था में ‘लीटर और किलोग्राम के बीच का अंतर अब पारदर्शिता का सवाल बनकर सामने आया है।’ जिले में 315 दुग्ध समितियां संचालित हैं। समितियों पर पशुपालक का दूध लीटर में दर्ज होता है, जबकि प्लांट स्तर पर इसकी मात्रा किलोग्राम में दर्ज की जाती है। दुग्ध संघ के अनुसार गुणवत्ता के आधार पर 100 लीटर दूध में करीब ‘2 से 3 किलो तक की बढ़त’ आती है। सवाल यही है—इस बढ़त का पूरा हिसाब पशुपालक को कितना और कैसे दिखाई देता है?

आंचल डेरी के असिस्टेंट डायरेक्टर सुनील अधिकारी के अनुसार दूध की गुणवत्ता के कारण लीटर और किलोग्राम के बीच अंतर आता है। 100 लीटर दूध में 2 से 3 किलो तक बढ़त हो सकती है। उनका कहना है कि इससे दूध उत्पादक को किसी प्रकार का नुकसान नहीं होता और यह दुग्ध समिति की आय का स्रोत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दूध उत्पादक को भुगतान लीटर के आधार पर ही किया जाता है। पशुपालकों के साथ हो रहा मजाक, लीटर और किलो के जाल में किसने उलझाया?

See also  ईडी ने 5 घंटे तक की हरीश रावत से पूछताछ, पूर्व सीएम बोले सत्ता के अहंकार और बदले की भावना से हो रही कार्रवाई

लेकिन पशुपालक राजेश बिष्ट ने इसी व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए जांच की मांग की है। उनका सवाल है कि जब समिति पर दूध लीटर में दर्ज हो रहा है और प्लांट पर वही दूध किलो में मापा जा रहा है, तो दोनों स्तरों के रिकॉर्ड का नियमित मिलान किस तरह होता है? यदि मात्रा में अंतर बनता है तो उसका लेखा-जोखा पशुपालक के सामने क्यों नहीं रखा जाता?

मसलन, यदि 100 लीटर दूध प्लांट पर गुणवत्ता के आधार पर 102 या 103 किलो दर्ज होता है, तो यह अंतर किस रिकॉर्ड में दर्ज होता है? इसका आर्थिक मूल्य क्या है? समिति को इससे कितनी आय होती है और उस आय का लेखा किस स्तर पर रखा जाता है? इन सवालों के जवाब जितने स्पष्ट होंगे, उतना ही पशुपालक का भरोसा मजबूत होगा।

See also  पिथौरागढ़ में 26 सितंबर को स्कूल बंद रहेंगे, बारिश के रेड अलर्ट की वजह से फैसला, प्रशासन ने सावधानी बरतने की अपील की

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि लीटर और किलोग्राम में अंतर होना अपने आप में किसी गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है। दूध का घनत्व पानी से अधिक होने के कारण मात्रा और वजन में अंतर वैज्ञानिक रूप से स्वाभाविक है। असली सवाल इस अंतर के आर्थिक लेखे-जोखे और रिकॉर्ड की पारदर्शिता का है।

दूध की खरीद में फैट-एसएनएफ, गुणवत्ता, तापमान, माप की प्रक्रिया और भुगतान का फार्मूला पहले से निर्धारित हैं तो इन्हें पशुपालकों के लिए सार्वजनिक और आसानी से समझने योग्य बनाया जाना चाहिए। समिति स्तर पर दर्ज मात्रा, प्लांट पर प्राप्त मात्रा और भुगतान की गणना के बीच यदि स्पष्ट मिलान उपलब्ध हो, तो किसी भी तरह की शंका की गुंजाइश नहीं रहेगी।

 

पशुपालक वर्षों से बढ़ती चारा लागत, पशुचिकित्सा खर्च, श्रम और पशुपालन के बढ़ते बोझ के बीच दूध उत्पादन कर रहे हैं। ऐसे में उन्हें केवल दूध की दर जानना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह भी जानने का अधिकार है कि उनके दूध की मात्रा कैसे मापी गई, किस आधार पर भुगतान हुआ और लीटर से किलो के बीच बनने वाले अंतर का लेखा-जोखा क्या है।

See also  बैंकिंग से जुड़ी सुरक्षा समिति की अहम बैठक

अब जरूरत आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि समिति से प्लांट तक दूध की मात्रा और भुगतान के रिकॉर्ड का पारदर्शी मिलान सामने रखने की है। यही प्रक्रिया साफ कर सकती है कि 100 लीटर दूध में बढ़ने वाले 2-3 किलो का पूरा आर्थिक हिसाब क्या है और उसका लाभ किस मद में दर्ज होता है।

क्योंकि सवाल दूध का ही नहीं, ‘पशुपालक के भरोसे का भी है।’